Saturday, 19 August 2017

#2925
राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे, मध्यप्रदेश की मंत्री यशोधरा व उनकी बहन उषा पर 10 हजार का हर्जाना लगा। राजमाता विजय राजे की वसीयत का मामला।
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मध्यप्रदेश के ग्वालियर के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश सचिन शर्मा की अदालत ने राजस्थान के सीएम वसुंधरा राजे मध्यप्रदेश की मंत्री यशोधरा राजे और उनकी बहन उषा राजे पर 10 हजार रुपए का हर्जाना लगाया है। न्यायाधीश शर्मा का मानना रहा कि तीनों बहने वसीयत के विवाद को लम्बित रखने के लिए बार-बार प्रार्थना पत्र पेश कर रही हैं। इसके साथ ही न्यायाधीश ने वाद प्रश्न की मांग वाला प्रार्थना पत्र भी खारिज कर दिया। न्यायाधीश शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि जुर्माना राशि का उपयोग गरीब बच्चों की शिक्षा पर किया जाए।
मां की वसीयत पर है आपत्ति:
ग्वालियर राज घराने की राजमाता रही ंविजय राजे सिंधिया ने अपनी जो वसीयत की है, उस पर तीनों बेटियों को ऐतराज है। मालूम हो कि स्वर्गीय विजय राजे सिंधिया ने अपने जीवन काल में ही जो वसीयत लिखी, उसमें राजघराने की सम्पत्ति को राज घराने से बाहर के लोगों को भी दिया गया है। अदालत में हो रही सुनवाई में कांग्रेस के सांसद ज्योतिरादित्य राजे भी शामिल हैं। ज्योतिरादित्य पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय माधवराज सिंधिया के पुत्र हैं। 
एस.पी.मित्तल) (19-08-17)
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#2924
राजनीति केवल भाग्य की नहीं, बल्कि पुरुषार्थ की मांग भी करती है। 
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अजमेर से जुड़े भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राज्यसभा सांसद भूपेन्द्र यादव का एक लेख 19 अगस्त को दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ है। भाजपा की राजनीति पर लिखा यह लेख जागरण से सफर करते हुए मेरे पाठकों के लिए भी प्रस्तुत है। 
केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां पीएम पद को 'प्रधानसेवकÓ का दर्जा देकर देश की जनता के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया, वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के इस ध्येय को संगठन के माध्यम से पार्टी में चरितार्थ करके संगठन कुशलता का परिचय दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बीते तीन वर्षों में अमित शाह ने एक संगठनकर्ता के रूप में अपनी कार्यप्रणाली से संगठन में कार्यकर्ता भाव को अपने आचरण एवं व्यवहार के माध्यम से जागृत करने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने पार्टी में हाईकमान प्रणाली को कभी भी स्वीकृति नहीं दी। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने किसी प्रकार की अनावश्यक सुविधा एवं खर्चे को अस्वीकार करते हुए आवश्यकता के अनुरूप विकल्पों का चयन किया, जैसे होटल के बजाय सरकारी गेस्ट हाउस का प्रयोग और जनसंघ की रीति-नीति के अनुसार सामान्य कार्यकर्ता एवं पार्टी पदाधिकारी के घर भोजन करना। राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां बनाते हुए भी उन्होंने बूथ, जिला एवं प्रदेश के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित करने की परंपरा का भी विकास किया है। यह भारतीय राजनीति का वह परंपरागत स्वरूप है जो वंशवाद और जातिवाद की राजनीति के बीच कहीं गौण होता गया, पर अमित शाह ने इसको न केवल फिर से विकसित किया, बल्कि भाजपा को कर्मठ कार्यकर्ताओं वाली पार्टी के रूप में मजबूती से स्थापित करने का कार्य भी किया। उन्होंने अपने साथियों और सहयोगियों को यह भी सिखाया कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता को सत्ता के साथ समन्वय स्थापित करके सकारात्मक एवं गुणात्मक कार्य करने चाहिए। आधुनिक शासन व्यवस्था में सरकार और संगठन का बेहतर तालमेल ही नवाचार ला सकता हैए यह पिछले तीन वर्षो में प्रकट हुआ है।
सामान्यतया तालमेल के अभाव में सरकार अपने सांगठनिक वोट बैंक की बंधक बन जाती है और नए फैसले नहीं ले पाती है, परंतु मोदी सरकार के साथ ऐसा नहीं है। गत तीन साल में अमित शाह के संगठनात्मक नेतृत्व में बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की राजनीतिक विचारधारा को कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने की एक शृंखलाबद्ध व्यवस्था शुरू की गई है। एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में भाजपा की कार्यप्रणाली को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए विभिन्न दायित्वों को आइटी एवं सोशल मीडिया, मीडिया प्रकाशन आदि विभागों में बांटकर अपने दौरों के माध्यम से प्रदेश स्तर तक इसे पहुंचाने का कार्य भी उन्होंने बखूबी किया है। इसके साथ ही उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सामाजिक दायित्वों को सुनिश्चित करने के लिए बेटी बचाओ, नामामि गंगे और स्वच्छता मिशन जैसे प्रकल्पों को भी खड़ा करने का कार्य किया है। कार्यकर्ता की वैचारिक स्पष्टता को पुख्ता करने और उसके दायित्वों के सही बोध को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रमों की व्यवस्था को भी सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया है।
पंडित दीनदयाल जन्म शताब्दी वर्ष में भाजपा द्वारा 15 दिन से एक साल तक एक विस्तारक कार्यकर्ता के लिए अन्य क्षेत्रों में कार्य करने की योजना तैयार की गई है। अमित शाह जब इस योजना पर कार्यकर्ताओं से संवाद करते हैं तो उनका स्पष्ट संदेश यही होता है कि हम जब पार्टी के लिए समय दे रहे हैं तो पार्टी इसका माध्यम हो सकती है, लेकिन इसका उद्देश्य देश की उन्नति की दिशा में समर्पित भाव से कार्य करने का ही होना चाहिए। उनके साथ कार्य करने वाले लोग यह जानते हैं कि वे परिश्रम की पराकाष्ठा दिखाते हैं। उनके साथ कार्य करके यह अनुभव आया है कि राजनीति केवल भाग्य की नहीं, बल्कि पुरुषार्थ की मांग भी करती है। मैंने महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और यूपी से लेकर गुजरात के राज्यसभा चुनाव तक उनके साथ कार्य किया है। मैंने देखा है कि पार्टी की प्रतिष्ठा के लिए वे बूथ कार्यकर्ता के साथ जुझारू व्यक्तित्व के तौर पर खड़े दिखाई देते हैं। वे कई बार पार्टी के लोगों से अनुशासन का हिसाब भी मांगते हैंए क्योंकि वे खुद कठोर अनुशासन के अनुपालक हैं। आमतौर पर बहुत छोटी और सामान्य सी लगने वाली बात के पीछे उनका दृष्टिकोण बेहद गहरा और व्यापक होता है। वे मानते हैं कि हमें अपने सार्वजनिक जीवन में ऐसी किसी वस्तु या विषय के प्रति लगाव का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए जो अनावश्यक लाभ लेने की प्रवृति अथवा उपहार संस्कृति को बढ़ावा दे, क्योंकि इससे कार्यकर्ता का नेतृत्व के प्रति भटकाव होता है। इस भटकाव से संगठन एवं देश के हितों की उपेक्षा कर निजी स्वार्थ की प्रवृति को बढ़ावा मिलता है। इस सामान्य से अनुशासन के माध्यम से उन्होंने शुद्ध राजनीतिक मिशन का एक संदेश प्रस्तुत किया है। पार्टी में भी वे पारदर्शिता को लेकर बेहद आग्रही हैं और इसीलिए अपने प्रवास में वे आजीवन सहयोग निधि का जिक्र करते हैं। उनका मानना है कि पार्टी का संचालन शुद्ध कोष व्यवस्था से ही होना चाहिए।
राजनीतिक क्षेत्र में एक बड़ा विषय समाज के हर स्तर पर संवाद स्थापित करने का है। अमित शाह की कार्यशैली कार्यकर्ताओं में प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता के भाव को जागृत करने का कार्य करती है। इसी वजह से तीन वर्ष के कार्यकाल में उनके नाम अनेक उपलब्धियां अर्जित हैं। इन वर्षो में पार्टी 10 करोड़ सदस्यों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है तो 18 राज्यों में भाजपा एवं सहयोगी दलों की सरकार चलाने का गौरव भी इसी कालखंड में पार्टी को हासिल हुआ है। गौर करने वाली बात यह है कि अमित शाह की दृष्टि से शासन का विस्तार महज शासकीय मानसिकता के साथ नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य लोक कल्याण में सामाजिक अपेक्षाओं को पूरा करने का भी होना चाहिए। पार्टी आधुनिकता से संपन्न हो, परंतु विचारों और परंपरागत मूल्यों का ह्रास न होने पाए, यह भी उनके द्वारा कार्यकर्ताओं के बीच अक्सर कहा जाता है। संवाद को स्पष्टता से रखना और अपनी वैचारिक निष्ठा के प्रति खुला दृष्टिकोण रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है और इसीलिए वे अपनी बात बेहद स्पष्टता से रखते हैं। सामाजिक न्याय, सर्वधर्म समभाव आदि को लेकर भाजपा के खिलाफ जो दुष्प्रचार किया जाता रहा है, उसके तर्कसंगत और तथ्यात्मक जवाब से अमित शाह सदैव लैस रहते हैं। वे कहते हैं कि हमने सिर्फ भाषण नहीं दिए हैं, बल्कि हमने ठोस रूप में इन आदर्शो के प्रति कदम उठाए हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आदर्शो पर जिस जनसंघ की बुनियाद रखी गई थीए भाजपा आज उसी मजबूत बुनियाद पर खड़ी है। पिछले सात दशकों में अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने त्याग और बलिदान से भाजपा को देश की राजनीति के द्र में स्थापित किया है। समर्पण भाव और ध्येय के बिना वर्तमान राजनीति में आगे नहीं बढ़ा जा सकताए यह अमित शाह बखूबी जानते हैं और इसीलिए एक कुशल रणनीतिकार, संगठक, अनुभवी प्रशासक और प्रभावी व्यक्तित्व के तौर पर उनकी पहचान होने के बावजूद वे भाजपा मिशन के कार्यकर्ता के रूप में अधिक दिखते हैं। वस्तुत: यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
एस.पी.मित्तल) (19-08-17)
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#2923
तो क्या अजमेर के भाजपा नेताओं को नजर लग गई है? अब केकड़ी के पूर्व विधायक और राज्य खादी बोर्ड के अध्यक्ष शंभुदयाल बडग़ुर्जर का निधन।
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पूर्व केन्द्रीय, राजस्थान किसान आयोग के अध्यक्ष और अजमेर के भाजपा सांसद सांवर लाल जाट के निधन के बाद अभी 12वें की रस्म भी नहीं हुई कि अजमेर से जुड़े एक ओर बड़े भाजपा नेता शम्भुदयाल बडग़ुर्जर का 19 अगस्त को जयपुर में निधन हो गया। बडग़ुर्जर अजमेर जिले के केकड़ी विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो बार भाजपा के विधायक रह चुके हैं। स्वर्गीय बडग़ुर्जर का अंतिम संस्कार 19 अगस्त को ही जयपुर में लाल कोठी स्थित श्मशान स्थल पर कर दिया गया। सीएम वसुंधरा राजे ने स्वर्गीय बडग़ुर्जर के निवास स्थान पर जाकर श्रद्धांजलि दी। चूंकि बडग़ुर्जर भाजपा के दिग्गज नेता होने के साथ-साथ वर्तमान में भी राज्य खादी बोर्ड के अध्यक्ष थे, इसलिए श्मशान स्थल पर अनेक मंत्री और भाजपा के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सांवरलाल जाट के निधन से भाजपा को अजमेर में जो क्षति हुई, वह अभी भरी भी नहीं थी कि भाजपा को अपने एक ओर प्रभावशाली नेता को खोना पड़ा है। बडग़ुर्जर का अजमेर की राजनीति में कितना असर रहा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बडग़र्जुर केकड़ी से वर्ष 1990 और 1993 में लगातार दो बार विधायक चुने गए। बडग़र्जुर ने पहला चुनाव जनता दल उम्मीदवार के तौर पर जीता और फिर भैरों सिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए जनतादल को तोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इसलिए 1993 में बडग़र्जुर ने भाजपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता। केकड़ी में आजादी के बाद से 14 बार विधानसभा के चुनाव हुए। हरिभाऊ उपाध्याय के बाद बडग़र्जुर दूसरे ऐसे नेता रहे जो दो बार केकड़ी के विधायक चुने गए। अधिकांशत: केकड़ी का विधायक दूसरी बार चुनाव नहीं जीता सका है। गत बार 2013 में कांग्रेस के उम्मीदवार रघु शर्मा का दावा था कि वे दूसरी बार भी चुनाव जीतेंगे। लेकिन उन्हें भाजपा के शत्रुघ्न गौतम से 8 हजार 867 मतों से हार का सामना करना पड़ा। बडग़र्जुर के निधन से केकड़ी विधानसभा क्षेत्र में भी शोक का माहौल रहा। भाजपा के देहात जिला अध्यक्ष बी.पी.सारस्वत ने बडग़र्जुर के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए माना कि इससे पार्टी को नुकसान हुआ है। 
पहाडिय़ा पछाड़:
केकड़ी में स्वर्गीय बडग़ुर्जर की पहचान पहाडिय़ा पछाड़ से हो गई थी। 1993 में बडग़र्जुर के सामने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जगन्नाथ पहाडिय़ा उम्मीदवार थे। तब कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पहाडिय़ा जैसे दिग्गज नेता चुनाव हार जाएगा। लेकिन बडग़ुर्जर ने 3 हजार 617 मतों से पहाडिय़ा को मात दे दी। पहाडिय़ा जैसे बड़े नेता को हरा देने पर ही बडग़र्जुर को पहाडिय़ा पछाड़ कहा जाने लगा। 
स्वर्गीय जाट के 12वें की रस्म 20 अगस्त को:
भाजपा के सांसद सांवरलाल जाट के 12वें की रस्म 20 अगस्त को अजमेर जिले के गोपालपुरा गांव में सम्पन्न होगी। प्रात: 10 बजे होने वाली पगड़ी की रस्म में कई केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के बड़े नेता उपस्थित रहेंगे। 
एस.पी.मित्तल) (19-08-17)
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#2922
उदयपुर के गीताजंलि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के नाम पर लूटने का मामला कोर्ट में पहुंचा। राजस्थान पत्रिका और एडवोकेट अजय जैन का आधार।
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राजस्थान ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के प्रमुख उदयपुर स्थित गीतांजलि मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में प्रवेश के नाम पर करोड़ों रुपए लूटने का मामला अब कोर्ट मे पहुंच गया है। जयपुर स्थित एसीबी कोर्ट संख्या एक ने 18 अगस्त को एक आदेश दिया है, जिसमें एसीबी से इस मामले में 22 सितम्बर तक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। इस गंभीर मामले में तत्कालीन विशिष्ट सचिव (चिकित्सा) श्रीमती रोली सिंह और चिकित्सा विभाग के ही अतिरिक्त निदेशक के साथ-साथ गीतांजलि एजुकेशन सोसायटी के जे.पी.अग्रवाल को भी आरोपी बनाया गया है। असल में हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील अजय कुमार जैन ने एसीबी में एक शिकायत दर्ज करवाई थी। इस शिकायत में आरोप लगाया गया कि उदयपुर में 10 एकड़ जमीन सरकार से रियायती दर पर लेने के बाद भी सरकार के नियमों के तहत कॉलेज में प्रवेश प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। कायदे से गीतांजलि को दी गई भूमि का आवंटन स्वत: ही निरस्त हो जाना चाहिए। लेकिन रोली सिंह जैसे अधिकारियों ने अपने दायित्व का निर्वाहन नहीं किया। जबकि इस कॉलेज ने करोड़ों रुपए लेकर प्रवेश दिए। प्रवेश परीक्षा लिए बिना ही 51 विद्यार्थियों को प्रवेश दे दिया गया। एडवोकेट जैन के प्रार्थना पत्र पर ही अब कोर्ट ने एसीबी से जांच रिपोर्ट तलब की है। सब जानते हैं कि गीतांजलि कॉलेज के मालिक बेहद प्रभावशाली हैं। इसीलिए मजबूर अभिभावक चुपचाप करोड़ों रुपए दे देते हैं। मशहूर डॉक्टरों को अपने बेटो ंको भी डॉक्टर बनवाना होता है। इसलिए वे गीतांजलि जैसे कॉलेजों का ही इस्तेमाल करते हैं। चूंकि सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्री भी उपकृत होते हैं। इसलिए शिकायत के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं होती। लेकिन एडवोकेट जैन ने हिम्मत दिखाई और सबूत एकत्रित कर गीतांजलि को कोर्ट तक ले गए। इसके लिए एडवोकेट जैन का आभार तो होना ही चाहिए। साथ ही राजस्थान पत्रिका का भी आभार व्यक्त किया जाना चाहिए कि उसने गीतांजलि कॉलेज के खिलाफ खबर प्रकाशित की है। गीतांजलि की ओर से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए के विज्ञापन दिए जाते हैं। लेकिन पत्रिका ने विज्ञापन के दबाव को हटाते हुए गीतांजलि के खिलाफ खबर लगाई है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में गीतांजलि अस्पताल के विज्ञापन पत्रिका में प्रकाशित न हो। पत्रिका ने इस सच्चाई को जानते हुए भी पाठकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई है। 
एस.पी.मित्तल) (19-08-17)
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#2921
ईद-उल-अजहा पर मुसलमानों की सुरक्षा के विशेष इंतजाम हो। हाजी शकील सेफी ने प्रधानमंत्री से अपील की।
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मुस्लिम युवा आतंकवाद विरोधी समिति के अध्यक्ष हाजी शकील सेफी ने 19 अगस्त को अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में जियारत की। जियारत के बाद पत्रकारों से संवाद करते हुए सेफी ने कहा कि आगामी 2 सितम्बर को मनाए जाने वाले ईद-उल-अजहा के पर्व पर देशभर में मुसलमानों की सुरक्षा के विशेष इंतजाम होने चाहिए। सेफी ने कहा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में कई बार यह स्वीकार किया है कि क थित गौ रक्षक हिंसा कर रहे है। ऐसे में अब प्रधानमंत्री का दायित्व है कि अब वह ईद-उल-अजहा मनाने वालों की सुरक्षा के इंतजाम करवा कर इसके लिए खास कर भाजपा शासित राज्यों में केन्द्र सरकार की ओर से एडवाइजरी जारी होनी चाहिए। सेफी ने कहा कि ईद-उल-अजहा के पर्व से पहले कुर्बानी के लिए बकरों की खरीद-फरोख्त होगी। मंडियों से बकरों को एक-दूसरे स्थान पर ले जाया जाएगा। क्योंकि बकरें की कुर्बानी मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं से जुड़ी हुई है इसलिए सुरक्षा के विशेष इंतजाम होने चाहिए। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सड़कों पर बेवजह हिंसा नहीं हो। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान एक धर्म निरपेक्ष देश है। यहां हर नागरिक अपने धर्म के अनुरुप रह सकता है। ऐसे में मुसलमानों के इस पर्व पर कोई हिंसक घटना न हो, इसके लिए विशेष इंतजाम होने चाहिए।
एस.पी.मित्तल) (19-08-17)
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