Thursday, 30 November 2017

#3337
अब दिल्ली में फंस गई फिल्म पद्मावती।
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निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली की विवादित फिल्म अब दिल्ली में फंस गई है। 30 नवम्बर को इस फिल्म को लेकर दिल्ली में संसदीय समिति और पिटीशन कमेटी की बैठकें हुई। इन दोनों ही बैठकों में यह माना गया कि पहले फिल्म की समीक्षा की जाएगी और समीक्षा इतिहासकार करेगें। अब फिल्म की समीक्षा कब होगी यह भगवान ही जानता है। पिटीशन कमेटी की बैठक में सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी, चित्तौड़ के सांसद सीपी जोशी, कोटा के सांसद ओम बिड़ला के साथ-साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे। सांसद सीपी जोशी का बैठक में साफ-साफ कहना रहा कि इस फिल्म को लेकर पूरे राजस्थान में राजपूत समाज आंदोलन कर रहा है। ऐसे में फिल्म में ऐसा कोई दृश्य नहीं होना चाहिए जो वीरांगना पद्मावती के सम्मान को कम करता हो। जोशी ने कहा कि हमें लोगों की भावनाओं का ख्याल भी रखना चाहिए। बैठक में सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कहा कि अभी इस फिल्म को अनुमति ही नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड विस्तृत समीक्षा के बाद ही अनुमति देगा। बैठक में जोशी ने सेंसर बोर्ड की अनुमति से पहले ही मीडिया के एक वर्ग को फिल्म दिखाए जाने पर नाराजगी जताई। इस बैठक के बाद सांसद अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता में संसदीय समिति की बैठक हुई। इस बैठक में ठाकुर का कहना रहा कि किसी भी निर्माता को इतिहास के साथ छेड़छाड़ की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस बैठक में निर्माता-निर्देशक भंसाली भी उपस्थित रहे।
हालांकि उन्होंने बार-बार कहा कि उनकी फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के प्रेस प्रसंग के दृश्य नहीं है और पूरी फिल्म रानी पद्मावती के शौर्य और वीरता पर फिल्माई गई है। इसके विपरीत अलाउद्दीन खिलजी को एक आक्रमणकारी और स्त्री लोलुप दिखाई गया है। लेकिन भंसाली के कथन पर किसी ने भी विश्वास नहीं किया और सर्वसम्मिति से यह तय किया गया कि इतिहासकारों की समीक्षा के बाद ही फिल्म के प्रदर्शन पर कोई निर्णय होगा। यानि जो पद्मावती फिल्म पहले मुम्बई के सेंसर बोर्ड में फंसी हुई मानी जा रही थी वह अब दिल्ली में सांसद के बीच फंस गई है। 
एस.पी.मित्तल) (30-11-17)
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#3336
आखिर सीएम राजे ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव तक का डीजीपी बना दिया। तीन आईपीएस की वरिष्ठता को दरकिनार कर ओपी गल्होत्रा को सौंपी राजस्थान पुलिस की कमान। 
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30 नवम्बर को राजस्थान के तीन आईपीएस अधिकारियों की वरिष्ठता को दरकिनार कर जूनियर आईपीएस ओपी गल्होत्रा को  नया डीजीपी नियुक्त कर दिया गया है। गल्होत्रा को अजीत सिंह के स्थान पर नियुक्ति दी गई है। अजीत सिंह चार माह डीजीपी रहने के बाद तीस नवम्बर को सेवानिवृत हो गए। हालांकि नवदीप सिंह, कपिल गर्ग और सुनील कुमार मेहरोत्रा सीनियर थे, लेकिन सीएम वसुंधरा राजे की पसंद होने की वजह से जूनियर गल्होत्रा को डीजीपी बनाया गया है। गल्होत्रा की सेवानिवृत्ति 2019 में होगी यानि वे अगले वर्ष होने वाले विधानसभा तथा फिर मई 2019 में होने वाले लोकसभा के चुनाव तक डीजीपी रहेंगे। हालांकि गल्होत्रा अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे, लेकिन 30 नवम्बर को गल्होत्रा की पदोन्नति डीजीपी के पद पर कर दी गई इसके साथ ही उनके सीनियर सुनील मेहरोत्रा को भी डीजी के पद पर पदोन्नत किया गया है। पहले यह माना जा रहा था कि अजीत सिंह के कार्यकाल को विस्तार दिया जाएगा, लेकिन केन्द्र सरकार की ओर से हरी झंडी नहीं मिलने की वजह से अजीत को निर्धारित समय पर ही सेवानिवृति देनी पड़ी। 
साप्ताहिक अवकाश पर विचार-गल्होत्रा
नई डीजीपी गल्होत्रा ने मीडिया से कहा कि पुलिस के जवानों के वेलफेयर के लिए अपने कार्यकाल में जो कुछ भी कर सकते हैं करेंगे। जवानों को साप्ताहिक अवकाश के सवाल पर गल्होत्रा ने कहा कि इस संबंध में आवश्यकता होने पर राज्य सरकार से भी वार्ता की जाएगी। उन्होंने माना कि जवानों का काम बेहद कठिन होता है इसलिए उन्हें पर्याप्त सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने की होगी। गल्होत्रा ने 30 नवम्बर की शाम को ही डीजीपी का पद संभाल लिया। इससे पहले अजीत सिंह को शानदार विदाई दी गई।
एस.पी.मित्तल) (30-11-17)
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#3335
आखिर कांग्रेसियों ने लगा दी इंदिरा गांधी की प्रतिमा। फोटो खिंचवाई और कपड़े से ढक दिया। अब पायलट करेंगे अनावरण।
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30 नवम्बर को आखिरकार अजमेर में स्टेशन रोड स्थित स्मारक पर पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की प्रतिमा स्थापित कर ही दी गई। प्रतिमा को लगाने के साथ ही अजमेर के कांग्रेसियों ने प्रतिमा के साथ फोटो खिंचवाया और कपड़े से प्रतिमा को ढक दिया। अब इस प्रतिमा का अनावरण जल्द ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट करेंगे। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष विजय जैन ने बताया कि प्रतिमा लगाने के लिए कांग्रेस को लम्बा संघर्ष करना पड़ा है। इस प्रतिमा को अजमेर विकास प्राधिकरण से शुल्क देकर खरीदा गया है। प्रतिमा लगने से शहर भर के कार्यकर्ताओं में उत्साह है। प्रतिमा लगाने की जानकारी प्रदेश अध्यक्ष पायलट को दे दी गई है और अब जल्द ही पायलट अजमेर आकर इस प्रतिमा का अनावरण करेंगे।
एस.पी.मित्तल) (30-11-17)
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#3334
किशनगढ़-उदयपुर के हवाई टिकिट पर राज्य सरकार देगी ढाई हजार रुपए का अनुदान। ढाई हजार रुपए यात्री से लेने के बाद भी सुप्रीम आॅर्गेनाइजेशन को एक हजार रुपए का घाटा। आखिर कैसे सफल होगा किशनगढ़ का एयरपोर्ट।
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गत 11 अक्टूबर को राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे ने अजमेर में किशनगढ़ एयरपोर्ट का उद्घाटन तो कर दिया, लेकिन अब इस एयरपोर्ट से विमान सेवाएं शुरू करने में सरकार को पसीने आ रहे हैं। यदि यात्रियों से वास्तविक किराया वसूला जाए तो शायद किशनगढ़ एयरपोर्ट चालू ही नहीं हो सके। इसलिए राज्य सरकार ने सुप्रीम आर्गेनाइजेशन से प्रदेशभर में हवाई सेवाओं के लिए एक समौता किया है। इस समझौते के तहत ही एक दिसम्बर से किशनगढ़ और उदयपुर के बीच हवाई सेवा शुरू हो रही है। सुप्रीम आर्गेनाजेशन के सीईओ अमित अग्रवाल ने बताया कि किशनगढ़-उदयपुर के बीच का किराया 6 हजार 500 रुपए होता है, लेकिन फिलहाल यात्रियों से मात्र ढाई हजार रुपए ही लिए जाएंगे। समझौते के अनुरूप प्रति यात्री सरकार ढाई हजार रुपए का अनुदान देगी। यही वजह है कि एक हजार रुपए का घाटा हमारी कंपनी को फिलहाल उठाना पड़ेगा। अग्रवाल ने कहा कि सीएम वसंुधरा राजे चाहती हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार के सदस्य भी हवाई यात्रा का आनंद ले सकें। सरकार ने जो सुविधा दी है उसका लाभ अधिक से अधिक लोगों को उठाना चाहिए। फिलहाल उनकी कंपनी 9 सीटर वाला विमान शुरू कर रही हैं। भविष्य में ट्रैफिक बढ़ेगा तो बड़ा विमान काम में लिया जाएगा। अग्रवाल ने बताया कि उनकी कंपनी ही समझौते के तहत जयपुर, उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर आदि में हवाई सेवाएं दे रही हैं। किशनगढ़-उदयपुर की नई सेवा का समय उदयपुर से प्रातः11ः15 पर उड़ान का रखा गया है जो 12ः15 पर किशनगढ़ पहुंचेगी। किशनगढ़ से ही विमान 12ः30 पर उदयपुर के लिए रवाना होगा। 
दिल्ली हवाई सेवा के लिए नहीं मिली अनुमतिः
किशनगढ़ एयरपोर्ट के निदेशक अशोक कपूर ने बताया कि दिल्ली हवाई सेवा के लिए अभी अनुमति नहीं मिली है। हालांकि जूम एयरलाइंस किशनगढ़ से दिल्ली के बीच अपनी सेवाएं देने को तैयार हैं, लेकिन अभी दिल्ली के एयरपोर्ट पर विमान के उतरने और उड़ान भरने की व्यवस्था नहीं हो रही है। उन्होंने माना कि दिल्ली सेवाओं में विलंब हो रहा है। उन्होंने बताया कि 1 दिसम्बर से उदयपुर के लिए शुरू होने वाली सेवा की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई है।
आखिर किसे मिलेगा लाभ?ः
हवाई जहाज में हवाई चप्पल वाला भी यात्रा करे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सपने को पूरा करने के लिए राजस्थान की सीएम वसंुधरा राजे प्रति यात्री भारी भरकम अनुदान दे रही हैं, लेकिन सवाल उठता है कि सरकार के अनुदान का लाभ किसे मिलेगा? क्या वाकई किशनगढ़ या उदयपुर का कोई ठेलेवाला हवाई चप्पल पहनकर सुप्रीम आॅर्गेनाइजेशन के विमान में यात्रा करेगा? फिलहाल तो ऐसा संभव नहीं लगता। इसलिए माना जा रहा है कि सरकार के अनुदान का लाभ धनाढ्य व्यक्ति ही उठाएंगें। 
50 दिन बाद भी सिर्फ उदयपुरः
सीएम राजे ने किशनगढ़ एयरपोर्ट का उद्घाटन 11 अक्टूबर को किया था। 50 दिन गुजर जाने के बाद भी सिर्फ उदयपुर के लिए सेवाएं शुरू हुई हैं। यह सेवा भी 24 घंटे में मात्र एक बार के लिए हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किशनगढ़ का एयरपोर्ट कितना सफल होगा। एक ओर सरकार यात्रियों के टिकिट पर हजारों रुपए का अनुदान दे रही है, वहीं एयरपोर्ट के संचालन पर प्रतिघंटे करोड़ों रुपए खर्च हो रहा है।
एस.पी.मित्तल) (30-11-17)
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#3333
अजमेर की जिला प्रमुख के तौर पर अब याद आती हैं सुशील कंवर पलाड़ा। आखिर वंदना नोगिया की बैठकों में क्यों नहीं आते अफसर?
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29 नवम्बर को अजमेर जिला परिषद की आयोजना समिति की बैठक ऐन मौके पर इसलिए रद्द करनी पड़ी कि संबंध्ंिात विभागों के अधिकारी आए ही नहीं। जबकि जिला प्रमुख वंदना नोगिया और सीईओ अरुण गर्ग तय समय पर पहुंच गए थे। जिन अफसरों को बैठक में आना था उनका कहना है कि जिला परिषद बैठक की सूचना मिली ही नहीं, जबकि सीईओ गर्ग का दावा है कि सूचना इनको भिजवाई गई थी। असल में किसी भी निर्वाचित संस्था में मुखिया का असर सबसे ज्यादा होता है। यदि मुखिया असरदार हो तो अफसरशाही हर हुक्म मानती है। जिला परिषद की बैठकों में अफसरों के नहीं पहुंचने की शिकायत आम है। कई बार बैठकों को रद्द किया जाता है। अब जब अजमेर में लोकसभा के उपचुनाव होने हैं, तब यदि जिला परिषद जैसी महत्वपूर्ण संस्था में आयोजना समिति की बैठक भी नहीं हो सके तो यह सत्तारुढ़ भाजपा की स्थिति पर सवालिया निशान लगाती है। यह जिला प्रमुख के लिए भी अच्छी बात नहीं है। और जब बार-बार ऐसी घटनाएं होती हैं तो राजनीतिक सूझबूझ पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है। इन दिनों जिला परिषद के जो हालात सामने आए हैं उनमें पूर्व जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा की याद अब सभी को आ रही है। पलाड़ा की अध्यक्षता में होने वाली बैठकों में अफसर ही नहीं विधायक एवं अन्य जनप्रतिनिधि भी उपस्थित रहते थे। पलाड़ा के कार्यकाल में सभी विभागों के अधिकारी बैठकों के प्रति जागरुक रहते थे। यहां तक कि जिला परिषद का स्टाफ भी जागरुक और सतर्क रहता था। पलाड़ा जब जिला प्रमुख थीं तब प्रदेश में कांग्रेस का शासन था, लेकिन इसके बावजूद भी पलाड़ा ने पंचायत समिति स्तर पर समस्या समाधान शिविर लगवाए। भले ही पलाड़ा भाजपा की जिला प्रमुख थीं, लेकिन सभी विभागों के अधिकारियों की उपस्थिति रहती थी। विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों में भी पलाड़ा ने जिला परिषद को सक्रिय बनाए रखा। अब जबकि प्रदेश में भाजपा की सरकार है, तब भी भाजपा की जिला प्रमुख की बैठक में अफसरों का नहीं आना अपने आप में विचित्र बात हैं। यह माना कि वंदना नोगिया राजनीति में नई हैं, लेकिन अब तो जिला प्रमुंख बने ढाई वर्ष से ज्यादा का समय हो गया है, ऐसे में कुछ तो प्रभाव बनना ही चाहिए। जबकि नोगिया को प्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी का भी समर्थन रहता है। देवनानी के प्रयासों से ही नोगिया जिला प्रमुख बन पाई थीं। देवनानी भी नोगिया को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, लेकिन नोगिया को अपनी भी राजनीतिक सूझबूझ दिखानी होीग। नोगिया पढ़ी लिखी युवा हैं, इसलिए जिले भर के लोगों खास कर ग्रामीणों को बहुत उम्मीदें हैं। अब जब सभी राजनीतिक परिस्थितियां अनुकूल हैं तो नोगिया को भी कार्य कुशलता दिखानी होगी। अफसरशाही उसे ही नमस्कार करती हैं, जिसके पास खुद का चमत्कार होता है।

एस.पी.मित्तल) (30-11-17)
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