Saturday, 25 November 2017

#3314
अलगाववादियों के हिमायती बताएं शोपिया में अपने घर आए जवान इरफान अहमद की हत्या क्यों की गई? क्या किसी कश्मीरी का देश की हिफाजत करना गुनाह है?
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25 नवम्बर को कश्मीर में शोपियां में भारतीय सेना के जवान इरफान अहमद डार का शव बरामद किया गया है। पुलिस सूत्रों के अनुसार इरफान उत्तरी कश्मीर के बांडीपोरा जिले में नियंत्रण रेखा के पास गुरेज सेक्टर में तैनात था, लेकिन इन दिनों छुट्टियां बिताने के लिए अपने घर आया था। एक दिन पहले ही इरफान का अपहरण हुआ और आज तड़के उसका शव बरामद किया गया। माना जा रहा है कि भारतीय सेना में काम करने की वजह से ही आतंकवादियों ने इरफान की हत्या की है। इस हत्या का जवाब अब कश्मीर के अलगाववादियों के हिमायतियों को देना चाहिए। अनेक मौकों पर राजनेता, लेखक, प्रगतिशील विचारक आदि अलगाववादियों की हिमायत में आकर खड़े हो जाते हैं। ऐसे हिमायती यह बताएं कि क्या कोई कश्मीरी देश की हिफाजत का काम नहीं कर सकता है? जो लोग दिल्ली में बैठ कर अलगाववादियों की हिमायत करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि कश्मीर में सेना के जवान भी अपना बलिदान देकर दिल्ली की सुरक्षा कर रहे हैं। आज कश्मीर में राजस्थान से लेकर असम और तमिलनाडु से लेकर दिल्ली के युवा सैनिक के तौर पर तैनात हैं। किसी भी प्रांत के सैनिक ने कभी भी कश्मीरियों की सुरक्षा से इंकार नहीं किया। उल्टे कश्मीरियों के विरोध के बाद भी हमारे जवान तैनात रहते हैं। कई बार तो एक तरफ से आतंकवादियों की गोलियां और दूसरी तरफ से अलगाववादियों के पत्थर खाने पड़ते हैं। कल्पना की जा सकती है कि तब हमारे सैनिकों के मन की स्थिति कैसी होती होगी? जिन कश्मीरियों की सुरक्षा के लिए आतंकियों की गोलियां खानी पड़ रही है वे ही पत्थर फेंक रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद भी अलगाववादियों की हिमायत की जाती है। ऐसे हिमायतियों को अब कम से कम इरफान की हत्या की निंदा तो करनी ही चाहिए। हिमायती यह भी बताएं कि इरफान के हत्यारों के साथ क्या किया जाए? इससे पहले भी आतंकियों ने सुरक्षा बल में कार्यरत अधिकारियों की हत्या की है। भारतीय सेना के जवान इरफान की हत्या के बाद कश्मीर के उन अधिकारियों की सुरक्षा को भी खतरा हो गया है जो राजस्थान सहित अन्य राज्यों से नियुक्त हंैं।
एस.पी.मित्तल) (25-11-17)
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#3313
नाहरगढ़ किले का मामला आपराधिक है। असल में पुलिस का सूचना तंत्र पूरी तरह फेल हो गया है। 22 पत्थरों पर लिखे की भनक तक नहीं लगी।
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जयपुर के ऐतिहासिक नाहरगढ़ किले की दीवार पर लटके मिले चेतन सैनी के शव की चर्चा इस समय पूरे देश में हो रही है। कुछ लोग इसे साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश भी कर रहे हैं। लेकिन सही में यह घटना एक आपराधिक घटना है। इसे फिल्म पद्मावती के विवाद से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। 25 नवम्बर को चेतन सैनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि मौत दम घुटने से हुई है। चेतन सैनी के परिजनों ने भी हत्या की आशंका जताई है। ऐसे में पुलिस को आपराधिक घटना मानकर जांच करनी चाहिए। लेकिन इतना जरूर है कि अब पुलिस का सूचना तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है। यूं कहने को तो राजस्थान पुलिस में गुप्तचार शाखा भी बनी हुई है, लेकिन यह शाखा कैसे काम करती है सब को पता है। नाहरगढ़ का किला जयपुर शहर की सीमा में ही आता है। 22 पत्थरों पर लिखने का मतलब कोई व्यक्ति घंटों तक यह कृत्य करता रहा। चेतन सैनी ने भी इसी किले पर खड़े होकर अपनी सेल्फी भी ली। यानि इस पूरे घटनाक्रम में एक से अधिक लोग शामिल थे और उन्हें लम्बा वक्ता भी लगा। यदि पुलिस का सूचना तंत्र मजबूत होता तो कोई न कोई व्यक्ति पुलिस को सूचना दे देता। लेकिन अब तो गुप्तचर शाखा में तैनात अधिकारियों की रुचि भी अपने मुखबीर बनाने में नहीं होती है। पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी कथित तौर पर भ्रष्टाचार में लगे रहते हैं। थानों पर तो जांच और सूचना एकत्रित करने का काम खत्म सा हो गया है, क्योंकि थाने पर तैनात पुलिस कार्मिक या तो वीआईपी ड्यूटी में या फिर चैराहे पर खड़ा होकर वसूली में लगा रहता है। यह माना कि अब पुलिस से ज्यादा साधन और तकनीक अपराधियों के पास हो गए हैं, लेकिन यदि पुलिस का सूचना तंत्र मजबूत हो तो ऐसे अपराधों पर काबू पाया जा सकता है। चेतन सैनी के किले की दीवार पर लटकने से जयपुर पुलिस की सक्रियता पर भी सवाल उठता है। जयपुर में आए दिन आपराधिक घटनाएं हो रही हैं। लेकिन उन पर कोई अंकुश नहीं लग रहा। जयपुर ही नहीं बल्कि राजस्थान भर में आपराधिक घटनाओं की संख्याएं लगातार बढ़ रही है। गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया का बार-बार यह कहना होता है कि मैं हर स्थान पर पुलिस वाले को तैनात नहीं कर सकता हंू। यह बात कटारिया की काफी हद तक सही भी है, क्योंकि आबादी के लिहाज से राजस्थान पुलिस में कार्मिकों की संख्या बहुत कम है। लेकिन यदि कटारिया पुलिस के सूचना तंत्र को मजबूत करें तो नाहरगढ़ के किले जैसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सकती है। 
एस.पी.मित्तल) (25-11-17)
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#3312
अब ममता बनर्जी ने दिया फिल्म पद्मावती पर चिढ़ाने वाला बयान।
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पश्चिम बंगाल की सीएम और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने घोषणा की है कि फिल्म पद्मावती के प्रदर्शन के समय पश्चिम बंगाल के सिनेमा घरों को पूर्ण सुरक्षा दी जाएगी। इतना ही नहीं बनर्जी ने फिल्म के निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली को भी अपने रज्य में फिल्म चलाने के लिए आमंत्रित किया है। बनर्जी के बयान से साफ जाहिर है कि वे सम्पूर्ण हिन्दू समाज को चिढ़ा रही हैं। जब पूरे देश में पद्मावती फिल्म का विरोध हो रहा है, तब एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए। भले ही बंगाल में राजपूत समाज की संख्या कम हो, लेकिन ममता को यह तो पता ही है कि राजस्थान सहित देशभर में राजपूतों ने फिल्म के प्रदर्शन को अपने सम्मान से जोड़ रखा है। वैसे भी ममता बनर्जी एक जुझारू नेत्री हैं और बंगाल में 25 वर्षों के वामपंथी शासन को उखाड़ कर सीएम बनी हैं। ममता ने संघर्ष के दिनों में कई बार वामपंथियों से अपमान भी सहा है। यहां तक कि उनकी हत्या की भी कोशिश की गई। ऐसी जुझारू महिला यदि वीरांगना पद्मावती को लेकर जनभावना के विरुद्ध कोई बयान दे तो आश्चर्य होता है। ममता को यह समझना चाहिए कि चित्तौड़ की रानी पद्मावती कोई फिल्म की पात्र नहीं हो सकती, क्योंकि पद्मावती ने एक आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी और उसकी अत्याचारी सेना से बचने के लिए पद्मावती ने 16 हजार स्त्रियों के साथ अग्निकुंड में कूद कर जान दे दी। क्या ऐसी वीर महिला किसी फिल्म में मनोरंजन का साधन हो सकती है? संजय लीला भंसाली तो पैसा कमाने के लिए फिल्म के प्रदर्शन पर उतारू हैं। भले ही इस फिल्म को भारतीय सेंसर बोर्ड ने अनुमति न दी हो, लेकिन ब्रिटेन में अनुमति लेकर फिल्म प्रदर्शन की कोशश जारी है। जिस भंसाली को अपने देश के कानून की परवाह नहीं है, उसकी मानसिकता कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ममता बनर्जी का बयान भी ऐसे समय आया है, अब अभी सेंसर बोर्ड ने फिल्म को अनुमति नहीं दी है। जब फिल्म को अनुमति ही नहीं मिली है तो फिर भंसाली को पश्चिम बंगाल आने का निमंत्रण क्यों दिया जा रहा है? क्या ममता बनर्जी सिर्फ जनभावनाओं को चिढ़ाने वाला काम कर रही हैं? ममता बनर्जी को यह गलतफहमी है कि फिल्म पद्मावती को देखने से बंगाल के मुसलमान खुश हो जाएंगे। ममता को यह पता होना चाहिए कि अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दीवान और मुस्लिम धर्मगुरु जैनुल आबेदीन ने एक बयान जारी कर इस फिल्म का विरोध किया है। दीवान आबेदीन ने मुसलमानों को भी आव्हान किया है कि वे राजपूत समाज से जुड़ कर फिल्म का विरोध करें।
एस.पी.मित्तल) (25-11-17)
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Friday, 24 November 2017

#3311
तो क्या अजमेर के व्यापारियों के साथ हथियार सप्लायर उस्मान और जुबेर ने धोखाधड़ी की? एटीएस की पूछताछ में व्यापारियों ने स्वयं को निर्दोष बताया।
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जम्मू-कश्मीर के फर्जी लाइसेंस के आधार पर हथियार खरीदने के प्रकरण में राजस्थान की एटीएस ने अब तक अजमेर के कई प्रमुख व्यापारियों को गिरफ्तार किया है। एटीएस का आरोप है कि इन व्यापारियों ने अजमेर के हथयारों के कारोबारी उस्मान और उसके पुत्र जुबेर से जम्मू-कश्मीर में बने फर्जी लाइसेंस के आधार पर हथियार खरीदे हैं। इन व्यापारियों ने अपने दस्तावेज देकर जम्मू-कश्मीर से लाइसेंस बनवाए। एटीएस के अफसरों का मानना है कि उस्मान और जुबेर से डील करते हुए इन व्यापारियों को फर्जीवाड़े के बारे में पता था। वहीं वयापारियों का कहना रहा कि उस्मान और जुबेर ने उनके साथ धोखा किया है। पीड़ित व्यापारियों का माल और माजना (इज्जत) दोनों गए हैं। अजमेर के बिल्डर राजीव मालू ने भी पूछताछ में बताया कि एक रिवाल्वर के लिए जुबेर को चार लाख रुपए दिए थे, तब जुबेर ने कहा था कि अजमेर के जिला मजिस्ट्रेट का लाइसेंस दिलवा देगा, लेकिन रिवाल्वर देते समय जुबेर ने जम्मू-कश्मीर में बना लाइसेंस दे दिया। जुबेर ने जम्मू-कश्मीर में उसके नाम का लाइसेंस कैसे बनवाया, जिसकी जानकारी उसे नहीं है। उसने लाइसेंस के लिए कोई दस्तावेज भी जुबेर को नहीं दिए थे। जुबेर से तब भी साफ-साफ कहा गया कि अजमेर का लाइसेंस चाहिए। जुबेर ने भरोसा दिलाया था कि वह जम्मू-कश्मीर के लाइसेंस का रजिस्ट्रेशन अजमेर में करवा देगा। मालू ने एटीएस को बताया कि जम्मू-कश्मीर वाला लाइसेंस भी जुबेर को लौटा दिया था तथा चार लाख रुपए में खरीदा रिवाल्वर भी पूर्ण ईमानदारी के साथ संबंधित पुलिस स्टेशन पर जमा करवा दिया। मालू का कहना रहा कि धोखाधड़ी तो हमारे साथ हुई है। हमारा तो इतना ही कसरू है कि हमने जुबेर जैसे चालक व्यक्ति से हथियार खरीदा। पूछताछ के बाद मालू को जमानत पर छोड़ दिया गया। हालांकि एटीएस का मानना है कि व्यापारियों को उस्मान और जुबेर की गतिविधियों के बारे में सब पता था, लेकिन हथियार रखने के शौक की वजह से जुबेर से डील की। अब जांच पड़ताल में वह भी यह पता चल रहा है कि उस्मान और जुबेर के तार कश्मीर के आतंकवादियों से भी जुड़े हुए हैं। एटीएस यह भी पता लगा रही है कि जुबेर ने कश्मीर में किन सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों की मिली भगत से लाइसेंस बनवाए। अभी अजमेर के अनेक व्यापारी एटीएस के निशाने पर हैं।
एस.पी.मित्तल) (24-11-17)
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#3310
जयपुर में जस्टिस माहेश्वरी ने राजस्थान पुलिस को लगाई लताड़ तो जोधपुर में जस्टिस लोढ़ा ने काले कानून पर सरकार की आपत्ति को खारिज किया।
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24 नवम्बर को राजस्थान हाईकोर्ट में सरकार और पुलिस के लिए सकंट का दिन रहा। हाईकोर्ट की जयपुर खंडपीठ के जस्टिस महेन्द्र माहेश्वरी ने सिरसा स्थित रामरहीम के डेरे से जयपुर की एक महिला के गायब हो जाने के मामले में राजस्थान पुलिस को जमकर लताड़ लगाई। जस्टिस माहेश्वरी ने यहां तक कहा कि क्या अब पुलिस को जांच करने का काम भी सिखाना पड़ेगा? कोर्ट ने इस बात पर अफसोस जताया कि सिरसा स्थित रामरहीम के डेेरे से महिला के गायब होने पर राजस्थान पुलिस ने गंभीरता के साथ जांच नहीं की है। जब पुलिस के पास महिला के पति का बयान और सबूत हैं कि महिला डेरे में ही गई थी और उसके बाद आज तक भी नहीं लौटी है। ऐसे में पुलिस को डेरे के अधिकारियों से सम्पर्क कर लापता महिला का पता लगाना चाहिए। जस्टिस माहेश्वरी ने कहा कि यदि पुलिस ने सही तरीके से काम नहीं किया तो संबंधित अधिकारी को नौकरी से भी हटाया जा सकता है। इस मामले में आगामी सात दिसम्बर को फिर सुनवाई होगी। जस्टिस माहेश्वरी का कहना रहा कि अगली सुनवाई पर पुलिस विस्तृत जांच पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें नहीं तो कोर्ट को सख्त निर्णय देना पड़ेगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि जयपुर के कमलेश नामक व्यक्ति ने जवाहर नगर पुलिस स्टेशन पर उसकी पत्नी के गायब होने की शिकायत दी है। पति का कहना है कि वह स्वयं अपनी पत्नी को सिरसा स्थित राम रहीम के डेरे में छोड़कर आया था, लेकिन इसके बाद से उसकी पत्नी लौटी नहीं है। पति को अपनी पत्नी की हत्या की आशंका भी है।
जोधपुर में भी नाराजगीः
हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ में भी 24 नवम्बर को सरकार को नाराजगी का सामना करना पड़ा। हुआ यूं कि सीआरपीसी में संशोधन के मामले में एक जनहित याचिका पर जस्टिस संगीतराज लोढ़ा सुनवाई कर रहे थे कि तभी अतिरिक्त महाधिवक्ता का कहना रहा कि इससे याचिकाकर्ता का कोई हित प्रभावित नहीं हो रहा है, इसलिए यचिका को खारिज कर दिया जाए। इस पर जस्टिस लोढ़ा ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह जनहित का मामला है और इससे पूरा प्रदेश प्रभावित है। सरकार की ओर से इस तरह की आपत्तियां शोभा नहीं देती हैं। इसी दौरान याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट नीलकमल बोहरा ने कहा कि सीआरपीसी में संशोधन के बिल से न्यायिक कार्य में तो हस्तक्षेप होगा ही, साथ ही प्रेस की आजादी भी खतरे में पड़ जाएगी। सरकार को इस काले कानून को रद्द किया जाना चाहिए। अब इस मामले में 28 नवम्बर को सुनवाई होगी।
एस.पी.मित्तल) (24-11-17)
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