Thursday, 31 December 2015

क्या मुस्लिम धर्म अपनाने से सालोदिया के पाप धुल जाएंगे।



राजस्थान के सीनियर आईएएस उमराव सालोदिया ने 31 दिसम्बर को हिन्दू धर्म छोड़कर मुस्लिम धर्म कबूल कर लिया है। मुस्लिम धर्म अपनाने का कारण सालोदिया ने स्वयं को राजस्थान का मुख्य सचिव नहीं बनाना बताया है। सीएम वसुंधरा राजे को लिखे पत्र में सालोदिया ने कहा कि यदि सी.एस.राजन का कार्यकाल 31 दिसम्बर को आगामी तीन माह के लिए नहीं बढ़ाया जाता तो सरकार को मुझे ही मुख्य सचिव बनाना पड़ता, क्योंकि मैं ही राजस्थान के आईएएस अफसरों मैं सीनियर हंू। मुझे सीएस पद से वंचित रखने के लिए ही राजन का एक्सटेंशन किया गया है। मुझे सीएस इसलिए नहीं बनाया जा रहा है, क्योंकि में दलित वर्ग से हंू। चुंकि मुस्लिम धर्म में जाति का कोई भेदभाव नहीं है, इसलिए मैं इस्लाम धर्म कबूल कर रहा हंू। सालोदिया ने इसके साथ ही स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति का प्रस्ताव भी कर दिया है। 
सालोदिया  की सेवा निवृत्ति में मात्र छह माह का समय रहा गया है। सरकार किसे सीएस बनाए यह सीएम पर निर्भर करता है। कई बार अनेक सीनियर आईएएस को परे ढकेलते हुए जूनियर आईएएस को सीएस बना दिया जाता है। लेकिन सीएस के पद से वंचित रहने वाले आईएएस न तो धर्म बदलते हैं और न ही स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेते हैं। सरकार भी ऐसे आईएएस अफसरों का मान सम्मान करते हुए सीएस के समकक्ष के पदों पर नियुक्ति दे देती है। सवाल उठता है कि सीएस नहीं बनाए जाने पर सालोदिया ने जिस तरह धर्म बदला है, उससे क्या सालोदिया के पाप धुल जाएंगे? सब जानते हैं कि राजस्थान राजस्व मंडल के अध्यक्ष पद पर रहते हुए सालोदिया ने जो अनियमितताएं की उसकी जांच एसीबी कर रही है। सालोदिया चाहते थे कि सीएस बनकर एसीबी की जांचों पर पानी फेर दें। सालोदिया को अच्छी तरह पता है कि आईएएस का कवच हटने के बाद गिरफ्तारी तय है। आज सालोदिया स्वयं को दलित बताकर भेदभाव का आरोप लगा रहे है तो छह माह बाद जब गिरफ्तारी होगी तो मुसलान होने की वजह से भेदभाव करने का आरोप लगा देंगे। फिर राजनीतिक दल भी असहिष्णुता के मुद्दे से सालोदिया को जोड़ देंगे। पूरा प्रदेश जानता है कि आईएएस की सेवा में रहते हुए सालोदिया ने क्या कारनामे किए हैं। आज सालोदिया को स्वयं के दलित होने की पीड़ा सता रही है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या कोई आईएएस भी दलित हो सकता है?
आईएएस की सेवा में रहते हुए न जाने स्वर्ण जाति के कितने प्रभावशाली लोग सालोदिया के सामने हाथ जोड़ कर खड़े रहे होंगे। सालोदिया जब भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे हुए तब दलित वर्ग याद आ रहा है, लेकिन क्या सालोदिया यह बता सकते हैं कि आईएएस की सेवा में रहते हुए कितने दलितों को राहत प्रदान की। अच्छा होता कि सालोदिया आईएएस रहते हुए दलितों को न्याय दिलवातेै। सब जानते हैं कि जब कोई दलित आईएएस बन जाता है तो वह स्वयं को राजा-महाराज से कम नहीं समझता है। यदि आईएएस बनने के बाद भी दलित स्वयं को दलित ही समझ कर अपने वर्ग के लोगों की समस्याओं का समाधान करवाए तो दलित समुदाय की स्थिति अपने आप मजबूत हो जाएगी। असल में सालोदिया ने आईएएस बनने के बाद दलितों से भेदभाव किया है। 
जहां तक इस्लाम धर्म कबूल करने का सवाल है तो कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो किसी गुनाहगार के गुनाह को माफ कर दे। धर्म हिन्दू हो, मुस्लिम हो या ईसाई हो। सभी धर्मों में एक सत्य है कि गुनाह की सजा तो मिलेगी ही। ऐसा नहीं हो सकता कि हिन्दू धर्म में गुनाह कर इस्लाम धर्म में जाने के बाद गुनाह अपने आप माफ हो जाएगा। जो गुनाह हिन्दू धर्म में किया है, उसकी सजा सालोदिया को इस्लाम धर्म में भी भुगतानी पड़ेगी। भारतीय संविधान के मुताबिक सालोदिया किसी भी धर्म में रह सकते हैं। सालोदिया चाहे तो इस्लाम धर्म के बाद ईसाई धर्म भी अपना सकते हैं। असल में सालोदिया ने अपने गुनाहों की वजह से बेवजह धर्म को बीच में घुसेड़ दिया है। 
(एस.पी. मित्तल)
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अजमेर के लिए यादगार बन गया वर्ष का अंतिम दिन



आम तौर पर ऐसा मौका कम ही होता है जब विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि प्रशासनिक अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार कलाकार, शिक्षाविद्, धर्मगुरु, समाजसेवी आदि एक साथ किसी समारोह में नजर आए। और जब वर्ष का अंतिम दिन और पहला दिन हो तो ऐसे समारोह की रौनक और बढ़ जाती है। अजयमेरू प्रेस क्लब का अध्यक्ष निर्वाचित होने पर 31 दिसम्बर को मैनें अपने पत्रकार साथियों का एक स्नेह समारोह अजमेर में विजयलक्ष्मी पार्क में रखा। इसमें पत्रकार साथियों ने विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि पत्रकारों के निमंत्रण पर अधिकांश प्रतिनिधियों ने समारोह में भाग लिया। मेरे साथ क्लब के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ.रमेश अग्रवाल और नवनिर्वाचित महासचिव प्रताप सनकत, पूर्व अध्यक्ष राजेन्द्र गुंजल, वरिष्ठ पत्रकार गिरधर तेजवानी, विनीत लोहिया, सत्यनारायण झाला आदि का भी मान सम्मान किया गया। उपस्थित प्रतिनिधियों की यही राय थी कि वर्ष के अंतिम दिन शहर के प्रमुख लोगों को एक साथ मिलने का अवसर मिल गया। राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष औंकारसिंह लखावत, प्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अनिता भदेल, नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी, विधायक शत्रुध्न गौतम, राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ललित के पंवार, एमडीएस यूनिवर्सिटी के कुलपति कैलाश सोडानी, मंडल रेल प्रबंधक नरेश सालेचा, जिला कलेक्टर डॉ.आरूषी मलिक, पुलिस अधीक्षक डॉ.नीतिनदीप ब्लग्गन, बारां के कार्यवाहक जिला एवं सत्र न्यायाधीश किशन गुर्जर, आईएएस अशफाक हुसैन, नरेश ठकराल, राजस्व मंडल के सदस्य एल डी यादव, मंडल के रजिस्ट्रार सी आर मीणा, अजमेर विकास प्राधिकरण की आयुक्त श्रीमती स्नेहलता पंवार, आरएएस अधिकारी भगवत सिंह राठौड़, श्रीमती प्रिया भार्गव, हीरालाल मीणा, नगर निगम के कार्यवाहक आयुक्त गजेन्द्र सिंह रलावता, शिक्षा बोर्ड के उपनिदेशक राजेन्द्र गुप्ता, अजमेर डिस्कॉम के उपनिदेशक  महेश शर्मा, विद्युत निगम के मुख्य अभियंता बी एस भाटी आदि उपस्थित थे। भाजपा के शहर जिला अध्यक्ष अरविंद यादव, उपमहापौर संपत सांखला, पूर्व विधायक डॉ.श्रीगोपाल बाहेती, पूर्व महापौर कमल बाकोलिया, वरिष्ठ वकील एस के सक्सेना, राजेश टंडन, सूर्यप्रकाश गांधी आदि उपस्थित थे।
स्नेह मिलन समारोह में ख्वाजा साहब की दरगाह के खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जादगान के सचिव वाहिद हुसैन अंगारा शाह, आलेबदर चिश्ती, इकबाल चिश्ती, मुनव्वर चिश्ती, जकरिया गुरदैजी,अंजुमन शेख जादगान के सदर आरिफ चिश्ती, तारागढ़ दरगाह कमेटी के अध्यक्ष मोहसीन सुल्तानी, इदारा दावतुल्ल हक के अध्यक्ष मौलाना अय्यूब कासमी, दरगाह कमेटी के सहायक नाजिमडॉ.मोहम्मद आदिल, अजीज भाई, कायमखानी समाज के प्रतिनिधि हाजी अलीम खां, पूर्व विधायक हाजी कय्यूम खां,  पूर्व पार्षद एहसान सुल्तानी, कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के जिलाध्यक्ष हाजी महमूद खान आदि उपस्थित थे। समारोह में राजगढ़ स्थित मसाणियां भैरव धाम के उपासक चम्पालाल महाराज ने भी अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। इसके साथ ही नाड़ी विशेषज्ञ पूरण सिंह, कथक कला केन्द्र की निदेशक सुश्री दृष्टि रॉय, अजमेर अग्रवाल समाज के अध्यक्ष एस एन गर्ग, पुष्कर स्थित जोगणियां धाम के उपासक भंवर जी, वैश्य महासभा के जिलाध्यक्ष सुभाष काबरा, जेएलएन मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के प्राचार्य डॉ. के सी अग्रवाल, सुप्रसिद्ध फिजीशियन डॉ.एस के अरोड़ा, डॉ. अशोक मित्तल, साहित्यकार बख्शीश सिंह, नाट्य निदेशक उमेश चौरसिया आदि उपस्थित थे।
समारोह में जनसम्पर्क विभाग के संयुक्त निदेशक प्यारे मोहन त्रिपाठी का भी अभिनंदन किया गया। त्रिपाठी आज ही सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के दिन ही सूचना केन्द्र के सभागार का लोकार्पण भी किया गया।
(एस.पी. मित्तल)
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Wednesday, 30 December 2015

अफसर रिटायर हो तो प्यारे मोहन त्रिपाठी की तरह।


राजस्थान सरकार के जनसम्पर्क निदेशालय के संयुक्त निदेशक प्यारे मोहन त्रिपाठी 31 दिसम्बर को अजमेर के सूचना केन्द्र से रिटायर हो रहे हैं। निदेशालय के इतिहास में यह पहला अवसर होगा, जब संयुक्त निदेशक स्तर का अधिकारी जिला मुख्यालय के सूचना केन्द्र से विदाई ले रहा है। सूचना केन्द्र से विदाई लेना कोई खामी नहीं है, बल्कि त्रिपाठी ने प्रदेश भर के जनसम्पर्क अधिकारियों के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत की है। यह तो अच्छा हुआ कि त्रिपाठी निदेशालय में जाकर नहीं बैठे। मेरा दावा है कि यदि त्रिपाठी जयपुर स्थित निदेशालय में नौकरी कर लेते तो निदेशक के पद से ही रिटायर होते। रिटायर भी आसानी से नहीं बल्कि जिस तरह मुख्य सचिव सी.एस.राजन ने एक्सटेंशन लिया है, ठीक उसी प्रकार त्रिपाठी भी एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन लेते रहते। अभी भी भले ही 31 दिसम्बर को त्रिपाठी अजमेर का सूचना केन्द्र छोड़ दे, लेकिन थोड़े दिन बाद किस सरकारी दफ्तर में बैठे मिले कुछ कहा नहीं जा सकता। कुछ लोग आलोचना करते हैं कि त्रिपाठी ने अपनी 35 वर्ष की नौकरी का अधिकांश समय अजमेर में गुजार दिया, लेकिन आलोचकों को यह समझना चाहिए कि त्रिपाठी में वो कला है जो साधारण अफसर में देखने को नहीं मिलती। त्रिपाठी 35 वर्ष की सेवा में दो तीन वर्ष के लिए चूरू, बीकानेर और भीलवाड़ा घूम आए, लेकिन इसके बाद अजमेर में ही झंडा गाड़े रखा। आज त्रिपाठी संयुक्त निदेशक के पद से रिटायर हो रहे हो, लेकिन उनकी पहचान पीआरओ (जनसम्पर्क अधिकारी) के रूप में ही बनी हुई है। स्वयं त्रिपाठी भी अपने आप को आज भी पीआरओ ही मानते हंै। यह त्रिपाठी का कमाल है कि अजमेर में पीआरओ पदोन्नत हुए तो फिर यहीं पर सहायक निदेशक, उपनिदेशक और संयुक््रत निदेशक की पदोन्नति प्राप्त की। तीन माह पहले जब उपनिदेशक से संयुक्त निदेशक पदोन्नत हुए तो इष्र्या रखने वालों ने कहा कि अब तो अजमेर से जाना ही पड़ेगा, क्योंकि पीआरओ के पद पर संयुक्त निदेशक कैसे काम कर सकता है। लेकिन त्रिपाठी ने सरकार से ऐसा आदेश निकलवाया, जिसमें लिखा गया कि संयुक्त निदेशक के पद पर पदोन्नति के बाद अग्रिम आदेशों तक त्रिपाठी अजमेर के सूचना केन्द्र में ही नियुक्त रहेंगे। सरकार का वो अग्रिम आदेश 30 दिसम्बर तक भी नहीं आया और पुराने आदेश से ही त्रिपाठी 31 दिसम्बर को रिटायर हो रहे हैं। 
राजस्थान में सरकार भाजपा और कांग्रेस की रही, लेकिन यदि राजस्थान में ममता बनर्जी की टीएमसी और जयललिता की आईडीएमके की सरकारें होती तो भी त्रिपाठी इसी तरह पीआरओ गिरी कर लेते। असल में सरकारों का कोई फर्क  नहीं पड़ता। अफसर ऐसा हो जो हर सरकार में फिट हो। मेरा मानना तो यह है कि एक जनवरी 2016 से त्रिपाठी को अजमेर में अफसरों का कोचिंग सेंटर खोल लेना चाहिए। इस सेंटर में अपने अनुभव से उन तरकीबों के बारे में विस्तार से जानकारी देनी चाहिए, ताकि अफसर एक ही कुर्सी पर जमा रहे। त्रिपाठी जिस कुर्सी पर बैठे, वो कुर्सी कांटों भरी है। इधर, तुनकमिजाज कलेक्टरों से पाला तो इधर धरती आसमान एक करने वाले पत्रकारों से संबंध। आलोचक कुछ भी कहें, लेकिन प्रशासन और प्रेस के बीच टिके रहने मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। त्रिपाठी को यह भी पता रहता था कि किस अधिकारी और किस पत्रकार को कितना सम्मान देना है। अजमेर जिले से जो विधायक मंत्री बनते थे, उन्हें भी यह पता रहता था कि त्रिपाठी जी ने बड़े-बड़े मंत्रियों को चलता कर दिया है। सिटी मजिस्ट्रेट, कलेक्टर, डिविजनल कमिश्नर, एस.पी., आईजी की तो त्रिपाठी की पीआरओ गिरी के सामने कोई स्थिति ही नहीं है। मुझे याद है कि वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में प्रदेशभर के पीआरओ की बैठक बुलाई थी तो भरी कॉन्फ्रेंस में त्रिपाठी ने ही कहा था कि पीआरओ तो नारद मुनि है। वसुंधरा राजे ने आश्चर्य से पूछा-कैसे? त्रिपाठी ने कहा मैडम जिस प्रकार नारद जी देवलोक की खबरों का प्रसारण इधर-उधर करते थे, उसी प्रकार पीआरओ सरकार की खबरों का प्रसारण मीडिया में करवाता है। त्रिपाठी के इस कथन के बाद ही राजे ने जनसम्पर्क विभाग को मजबूती प्रदान करवाई। साठ वर्ष की उम्र में भी त्रिपाठी युवा बने हुए है। 31 दिसम्बर को रिटायर होने से पहले सूचना केन्द्र के रंगमंच का लोकार्पण भी करवा रहे हैं। इसे त्रिपाठी की सफलता ही कहा जाएगा कि इस समारोह में केन्द्रीय मंत्री, प्रदेश के मंत्री तमाम प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहेंगे। इस समारोह को ही त्रिपाठी का विदाई समारोह कहा गया है। अब यदि किसी को त्रिपाठी की काबिलीयत समझ में नहीं आ रही है तो उसकी अक्ल का भगवान ही मालिक है। मेरा त्रिपाठी जी से पारिवारिक संबंध हैं। मेरे सुख-दुख में त्रिपाठी साथी रहे हैं। मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि त्रिपाठी जी को जल्द से जल्द किसी सरकारी महकमे में काम करने का अवसर मिले। बिना किसी विवाद के रिटायर हो जाना भी अपने आप में मायने रखता है। ईश्वर ने त्रिपाठी को जो मिलनसारिता प्रदान की है, वह हमेशा बनी रहे। त्रिपाठी के छोटे भाई प्रेम प्रकाश त्रिपाठी इस समय जयपुर में मुख्यमंत्री सचिवालय में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत हैं।  अगले चार माह में प्रेम प्रकाश त्रिपाठी भी प्रदेश के जनसम्पर्क विभाग में सबसे वरिष्ठ अफसर होंगे। 

(एस.पी. मित्तल)
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बच्चे के जन्म के साथ ही मिट्टी और पत्थरों से भरी तगारियां उठानी पड़ती है मां को।


केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी ने श्रम मंत्रालय से कहा है कि निजी संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं को भी छह माह का मातृत्व अवकाश देने का कानून बनाया जाए। वर्तमान में निजी संस्थानों में मात्र तीन माह के अवकाश का ही प्रावधान है। यानि कंपनियों में काम करने वाली कोई महिला बच्चे को जन्म देती है तो उसे 6 माह का अवकाश दिया जाएगा। इस अवधि में मालिक को पूरा वेतन देना पड़ेगा। ऐसी सुविधा सरकारी संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं को मिलती है। श्रीमती मेनका गांधी ने जो प्रस्ताव रखा है, वह मेरी समझ से परे हैं। मेनका गांधी ने सिर्फ उन कामकाजी महिलाओं की चिंता की है जिनका प्रतिशत मुश्किल से पांच होगा। मेनका गांधी ने ग्रामीण क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं को मातृत्व अवकाश मिले, इस पर चिंता नहीं जताई है। हम अपने आस-पड़ौस और शहरी क्षेत्रों में देखते हैं कि जब कोई सड़क खोदी जाती है तो उसमें महिला श्रमिकों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। इसी प्रकार जब कोई बहुमंजिला इमारत निर्माणाधीन होती है, तब भी हमें यही कामकाजी महिलाएं नजर आती हैं। हम रोज देखते हैं कि गरीब और जरुरतमंद महिलाएं बच्चा जनने के साथ ही अपने सिर पर पत्थर और मिट्टी से भरी तगारियां रखकर इधर-उधर ले जाती हंै। शायद मेनका गांधी भी अपने संसदीय क्षेत्र में अपनी आंखों से देखती होंगी कि ऐसी महिला श्रमिक निर्माण स्थल पर ही अपने एक दो माह के शिशु को बीच-बीच में दूध भी पिलाती है। इस बेचारी महिला को बच्चा जनने के बाद पर्याप्त खाद्य सामग्री भी नहीं मिल पाती है। लेकिन हमारी इस महिला की हिम्मत देखिए कि बच्चा जनने के दस-बीस दिन पहले तक और बच्चा जनने के मुश्किल से दस दिनों बाद ही पत्थर और मिट्टी ढोने का काम करती है। यदि देश में जांच की जाए तो 80 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं बिना मातृत्व अवकाश के काम करती हैं। यदि मेनका गांधी को कामकाजी महिलाओं की इतनी ही चिंता है तो उन्हें ग्रामीण क्षेत्र की महिला श्रमिकों के बारे में चिंता करनी चाहिए। निजी कंपनियों में तो काम करने वाली महिलाओं को हजारों में नहीं, लाखों में प्रतिमाह वेतन मिलता है, जबकि ठेकेदार के यहां काम करने वाली महिला श्रमिक को दिन भर में मुश्किल से 300 रुपए मिल पाते हैं। लाखों महिला श्रमिकों को निर्माण स्थल पर ही झौंपड़ी बनाकर रहना होता है। 

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Monday, 28 December 2015

रलावताबने अजमेर नगर निगम के कार्यवाहक आयुक्त

 
अजमेर नगर निगम के आयुक्त एच.गुइटे (आईएएस) के लम्बे अवकाश पर चले जाने की वजह से उपायुक्त विकास गजेन्द्र सिंह रलावता को निगम का कार्यवाहक आयुक्त नियुक्त किया गया है। गुइटे 29 दिसम्बर, 2015 से 18 जनवरी, 2016 तक अवकाश पर रहेंगे। गुइटे के अवकाश की अवधि में रलावता आयुक्त का कामकाज भी करेंगे। रलावता को बिलों को पारित करने की वित्तीय स्वीकृति और चेकों पर हस्ताक्षर करने के लिए भी अधिकृत किया गया है। 
आरएएस को नहीं दिया चार्ज:
नगर निगम से आयुक्त के बाद दो उपायुक्त नियुक्त है। रलावता जहां नगर पालिका सेवा के अधिकारी है, वहीं श्रीमती सीमा शर्मा आरएएस है। लेकिन गुइटे ने अपने आयुक्त पद का चार्ज आरएएस को न देकर रलावता को दिया है। उल्लेखनीय है कि गुइटे और श्रीमती सीमा शर्मा के बीच निगम के कामकाज को लेकर विवाद चल रहा है। 

(एस.पी. मित्तल)
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जगतगुरु रामदयाल जी महाराज की प्रशंसा ने कर दिया भावविभोर।



अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त धार्मिक नगरी अजमेर में 51 अरब रामनाम मंत्रों की परिक्रमा का आयोजन हो रहा है। 27 दिसम्बर को इस आयोजन में अखिल भारतीय रामस्नेही सम्प्रदाय के महामंडलेश्वर जगतगुरु रामदयाल जी महाराज को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया। एक पत्रकार के तौर पर रामदयाल जी महाराज ने मुझे सम्मानित कर आशीर्वाद दिया। रामदयाल जी से मैं कोई 15 वर्ष बाद मिला था। मुझे देखते ही महाराज ने आत्मियता के साथ पूछा-मित्तलजी कैसे हो। मैंने कहा बस आपका आशीर्वाद बना रहे। मंच पर यह मुलाकात मुश्किल से दो मिनट की रही होगी। लेकिन जब महाराज ने अपने प्रवचनों में 15 वर्ष पूर्व मेरे साथ रहे संबंधों का सार्वजनिक बयान किया तो मेरी आंखों में आसूं आ गए। मुझे भी इस बात का आभास नहीं था कि 15 वर्ष पूर्व के संबंधों में जगतगुरु जैसे महाराज याद रखेंगे। महाराज ने कहा कि 15 वर्ष पूर्व जब मैंने धार्मिक नगरी पुष्कर में चातुर्मास किया था, तब मित्तल जी ने अपने लोकल न्यूज चैनल अब तक में मेरे प्रवचनों को प्रतिदिन प्रसारित किया। जिस आत्मियता के साथ रामदयाल जी ने मेरे बारे में कहा उससे मेरी आंखों में आसूं तो थे ही साथ ही इस बात का भी एक बार फिर अहसास हुआ कि पूर्व में किए गए सद्कार्यों का कभी न कभी फल तो मिलता ही है। मेरे लिए इससे बड़े सम्मान की और क्या बात हो सकती थी कि जब 51 अरब राम नाम के परिक्रमा समारोह में हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हो तब जगतगुरु के पद पर विराजमान कोईसंत अपने संबंधों का उल्लेख करें। मुझे भी याद आया कि दैनिक भास्कर के मुख्य संवाददाता की नौकरी छोडऩे के बाद जब मैंने वर्ष 2001 में उत्तर भारत का पहला केबल न्यूज चैनल अजमेर में शुरू किया था, तब रामदयाल जी महाराज ने अपना चातुर्मास पुष्कर में किया। तब मैंने ही महाराज के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि हमारा वीडियोग्राफर प्रतिदिन प्रवचनों की रिकॉर्डिंग करेगा और फिर प्रवचनों का प्रसारण किया जाएगा। चार माह तक जब मेरे अजमेर अब तक न्यूज चैनल पर महाराज के प्रवचन प्रसारित हुए तो चैनल को भी लोकप्रियता मिली। 

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राजनाथ सिंह और अनुपम खेर के बयानों का स्वागत होना चाहिए।


भारत के आम मुसलमानों के लिए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और कश्मीर से धारा 370 हटाने को लेकर फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने जो बयान दिए हैं, उनका राष्ट्रहित में स्वागत किया जाना चाहिए। 27 दिसम्बर को लखनऊ में आयोजित एक समारोह में सिंह ने बड़े गर्व से कहा कि भारत का कोई मुसलमान नहीं चाहता कि उसका बच्चा खूंखार आतंकी संगठन आईएस में शामिल हो। देश के गृहमंत्री का यह जज्बा बताता है कि वे अपने देश के नागरिकों पर कितना भरोसा करते हैं। सिंह ने यह बयान तब दिया है, जब लगातार खबरें आ रही हंै कि भारत के मुस्लिम युवक आईएस की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसको लेकर कुछ कट्टरपंथी संगठन दुष्प्रचार भी कर रहे हैं। ऐसे तत्वों का कहना है कि भारत में जो माहौल है, उसकी वजह से मुस्लिम युवक आईएस की ओर आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन ऐसी सभी धारणाओं को राजनाथ सिंह ने नकार दिया है। सिंह का यह भी कहना रहा कि आईएस जैसे संगठन मुस्लिम युवकों को भले ही कितना भी लालच दें, लेकिन हमारे युवक ऐसे लालच में कभी नहीं फसेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के जितने भी मुस्लिम देश हैं, उन सबके मुकाबले भारत में आम नागरिक सुकून के साथ रह रहा है। 
इसी प्रकार फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने भी कश्मीर से धारा 370 हटाने को लेकर अभियान की शुरुआत की है। खेर ने यह सवाल उठाया है कि कश्मीर में देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले मुसलमान सिक्ख, बंगाली, हिन्दू आदि लोग जाकर क्यों नहीं रह सकते? आज कश्मीर में रोजाना जो आतंकी वारदातें हो रही हैं, उसका मुख्य कारण यही है कि हमारा कश्मीर देश के दूसरे राज्यों से कटा हुआ है और इसका कारण सिर्फ धारा 370 का लागू होना है। 370 की वजह से ही 4 लाख हिन्दुओं को कश्मीर से पीट-पीट कर भगा दिया। जब हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है तो फिर कश्मीर में हिन्दू, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध आदि क्यों नहीं रह सकते? खेर ने कहा कि यह अजीब बात है कि कश्मीर को छोड़कर देश के दूसरे प्रांतों में धर्मनिरपेक्षता की बात कही जाती है और कश्मीर में धारा 370 की आड़ में सिर्फ एक समुदाय के व्यक्तियों को ही रहने का अधिकार दिया जाता है। जब कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं तो फिर देश से अलग क्यों है? आजादी के समय जिन हालातों में कश्मीर में धारा 370 लागू की गई थी, वे हालात अब नहीं है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में 370 लगे रहने से देश के आम मुसलमानों का कोई फायदा नहीं है। हम यदि देश में धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो चार लाख हिन्दुओं को भी कश्मीर में अपने घरों में बसाना चाहिए। मैं इसको लेकर कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक जनजागरण करुंगा। खेर और राजनाथ सिंह ने जो ताजा बयान दिए हैं, उन्हें वर्तमान परिपेक्ष में अनेक समस्याओं का समाधान माना जाना चाहिए। 

(एस.पी. मित्तल)
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Sunday, 27 December 2015

अजमेर जिले के पत्रकारों का आभार।


27 दिसम्बर को अजयमेरु प्रेस क्लब के चुनावों में बहुमत के साथ मुझे अध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया है। इसी प्रकार महासचिव पद पर दैनिक भास्कर के उपमुख्य संपादक प्रताप सनकत का निर्विरोध निर्वाचन हुआ। चुनाव के बाद वरिष्ठ पत्रकार सुरेश कासलीवाल ने भरोसा दिलाया कि क्लब के सफल संचालन में उनका सहयोग मिलता रहेगा। निर्वाचन अधिकारी और क्लब के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. रमेश अग्रवाल ने उम्मीद जताई कि नए पदाधिकारी क्लब को और आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और मुझे संतोष है कि शांतिपूर्ण तरीके से नए पदाधिकारियों का चयन हो गया है। क्लब के पूर्व अध्यक्ष नरेन्द्र चौहान ने कहा कि अजयमेरु प्रेस क्लब को दोबारा से सक्रिय करने में डॉ. रमेश अग्रवाल ने पिछले डेढ़ वर्ष से कड़ी मेहनत की है। जिले भर के पत्रकार आज इस क्लब को जिस नए स्वरूप में देख रहे है उसका श्रेय डॉ. अग्रवाल को ही जाता है। पूर्व अध्यक्ष राजेन्द्र गुंजल ने कहा कि डॉ. अग्रवाल ने क्लब को जो गति दी है, उसे नए पदाधिकारियों को बनाए रखनी चाहिए। नवनिर्वाचित महासचिव प्रताप सनकत का कहना रहा कि क्लब का संचालन सभी सदस्यों के सहयोग से किया जाए। कार्यकारिणी के शेष पदाधिकारियों और सदस्यों का निर्णय भी आपसी सहमति से होगा। सनकत ने उम्मीद जताई कि निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. अग्रवाल और निवर्तमान कार्यकारिणी  के सभी पदाधिकारियों को सहयोग भी हमेशा मिलता रहेगा। 
पत्रकारों का आभार:
अजयमेरु प्रेस क्लब अजमेर जिले के पत्रकारों का अग्रणीय संस्थान है। इसमें दैनिक समाचार पत्रों में काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक आदि समाचारपत्रों के संपादक, प्रतिनिधि, देश भर के राष्ट्रीय अखबारों के संवाददाता, इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनलों के प्रतिनिधि, वीडियो ग्राफर, फोटो ग्राफर शामिल है। 27 दिसम्बर को चुनाव में मुझे सभी का सहयोग मिला। मेरे प्रति जिलेभर के पत्रकारों ने जो आत्मीयता दिखाई उससे में भाव विभोर हंू। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि मैं बेहद ही संवेदनशील इंसान हंू। छोटी-छोटी घटना का मेरे मन मस्तिष्क पर गहरा असर होता है। यहां तक की मेरे ब्लॉग पर जो सकारात्मक और नकारात्मक टिप्पणी होती है, उससे भी मैं प्रभावित होता हंू। मेरे लिए यह बेहद सम्मान की बात है कि मैं अजयमेरु प्रेस क्लब जैसी संस्था का अध्यक्ष निर्वाचित हुआ हंू। मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि जो जिम्मेदारी जिलेभर के पत्रकारों ने दी है, उसका निर्वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करूं। मैं इस मौके पर उन सभी पत्रकारों, शुभचिंतकों और मेरे चाहने वालों का आभारी हंू। जिनकी सद्भावना से मैं अध्यक्ष बना हंू। इसमें कोई दोराय नहीं कि प्रेस क्लब को पुनजीर्वित करने में दैनिक भास्कर के अजमेर संस्करण के संपादक और क्लब के अध्यक्ष डॉ. अग्रवाल ने सक्रिय और महत्ती भूमिका निभाई। डॉ. अग्रवाल ने क्लब को एक संयुक्त परिवार की भावना से चलाया। मैं उम्मीद करता हंू कि डॉ. अग्रवाल की सक्रियता प्रेस क्लब में हमेशा बनी रहे। मैं भले ही अध्यक्ष चुना गया,लेकिन प्रेस क्लब डॉ. अग्रवाल के मार्ग निर्देशन में ही चलेगा। किन्हीं कारणों से जो पत्रकार साथी सक्रिय नहीं रहे, उनसे भी मेरा निवेदन है कि वे अपनी इस संस्था को मजबूती प्रदान करें। 

(एस.पी. मित्तल)
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Saturday, 26 December 2015

समस्याओं के समाधान के साथ-साथ आटा-कम्बल भी मिल रहे हैं



शिविर में एक विधायक दम्पत्ति की अनूठी पहल
यदि किसी राहत शिविर में ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान मौके पर हो जाए और जरूरतमंद व्यक्ति  को कड़कड़ाती सर्दी में गर्म कम्बल तथा दस किलों आटा मिल जाए तो इससे बड़ी राहत क्या हो सकती है। ऐसी ही अनूठी राहत अजमेर जिले के मसूदा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा और उनके पति समाजसेवी भंवरसिंह पलाड़ा उपलब्ध करवा रहे है। हालाकि सरकार की ओर से समय-समय पर ऐसे समाधान शिविर आयोजित होते है लेकिन ऐसे शिविरों के बाद भी ग्रामीणों की शिकायत बनी रहती है लेकिन पलाड़ा दम्पत्ति जो शिविर आयोजित कर रहे है उससे संबंधित गांवों के ग्रामीण संतुष्ट है। चूंकि अपने विधानसभा क्षेत्र में पलाड़ा दम्पत्ति का मान सम्मान और दबदबा है इसलिए शिविर में जहां सभी विभागों के अधिकारी उपस्थित रहते है वहीं ग्रामीण भी बड़ी संख्या में आते है। पलाड़ा दम्पत्ति का यह प्रयास होता है कि समस्या का समाधान मौके पर ही कर दिया जाए ताकि ग्रामीण व्यक्ति को सरकारी विभागों के धक्के न खाने पड़े। शिविर में कई बार जब अधिकारी ना नुकुर करते है तो पलाड़ा दम्पत्ति ही ऐसा रास्ता निकालते है जिससे परेशान ग्रामीण का काम हो ही जाए। शिविर में समस्याओं का समाधान तो सरकारी स्तर पर होता ही है साथ ही पलाड़ा दम्पत्ति निजी स्तर पर गर्म कम्बल और दस किलो आटा हर जरूरतमंद व्यक्ति को देते है। इसके लिए शिविर में पहले ही जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सहयोग से सूची बनवाई जाती है। जिन ग्रामीणों का कोई सरकारी काम नहीं होता वे सर्दी में कम्बल और आटा लेने के लिए शिविर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते है। मसूदा विधानसभा क्षेत्र में अब तक अंधेरी देवरी और बांदनवाड़ा में ऐसे शिविर आयोजित किए जा चुके है जबकि आगामी 29 दिसम्बर को खरवा, 30 को देवलियाकलां, 6 जनवरी को मोयणा, 7 जनवरी को रामयालिया, 13 को जीवाणा, 15 को केरोट, 20 को सथाना, 21 को चापानेरी, 27 को बेगलियावास, 28 को पाडलियां, 3 फरवरी को रामगढ़ तथा 4 फरवरी को सिंगावल में शिविर रखे गए है। प्रत्येक शिविर में 3-4 ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों को आमंत्रित किया जाता है।
पहले भी चलाया गया था अभियान
श्रीमती पलाड़ा पूर्व में जब जिलाप्रमुख के पद पर थी, तब भी जिला प्रमुख आपके द्वार अभियान चलाया गया था। इस अभियान के शिविरों में अनाज और अन्य सामग्री नि:शुल्क वितरित की गई तब इस अभियान की प्रशंसा तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी की थी। उल्लेखनीय कार्यों के लिए श्रीमती पलाड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया था।
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साथ जीने और मरने वालों की चिता भी एक बनी



26 दिसम्बर को अजमेर जिले के केकड़ी कस्बे के निकटवर्ती गांव बोगला का माहौल उस समय गमगीन हो गया जब एक ही चिता पर दो युवकों के शवों को रखा गया। ग्रामीणों ने आंसू टपकाते हुए शवों को अग्नि को समर्पित किया। इस गमगीन मौके पर केकड़ी के विधायक शत्रुध्न गौतम भी उपस्थित रहे। गौतम ने परिजनों को भरोसा दिलाया कि सरकार की ओर से जो भी मदद होगी वह दिलवाई जाएगी। दोनों मृतकों की दोस्ती को देखते हुए ही गांव वालों ने एक ही चिता पर अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। युवक बलभद्र शर्मा और प्रेमराज जाट प्रगाढ दोस्त थे। 25 दिसम्बर रात को जब दोनों युवक बाइक पर अपने गांव लौट रहे थे तब अजमेर-कोटा राजमार्ग पर खारी नदी की पुलिया पर बाइक एक ट्रक से टकरा गई। भिड़ंत इतनी तेज थी कि दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। यानि बलभद्र और प्रेमराज एक साथ जिए और एक साथ ही मरे। इस स्थिति को देखते हुए ही गांव वालों ने भारी मन से एक चिता बनाई और दोनों के शवों को अग्नि को समर्पित किया। दो युवकों का एक चिता की घटना संपूर्ण केकड़ी क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।
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सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए राम नाम मंत्र का जाप एक को



देश की चारों दिशाओं की सीमाओं पर तैनात भारतीय सैनिकों को ईश्वरीय ताकत देने के लिए अजमेर के आजाद पार्क में एक जनवरी को श्रीराम जय राम जय जय राम मंत्र का जाप किया जाएगा। मालूम हो कि आजाद पार्क में बनाई गई अयोध्या नगरी में 51 अरब राम नाम मंत्रों की पुस्तकों की परिक्रमा का कार्यक्रम गत 21 दिसम्बर से चल रहा है।
परिक्रमा आयोजन समिति के संयोजक सुनील दत्त जैन, सहसंयोजक कंवलप्रकाश किशनानी, सुभाष काबरा और उमेश गर्ग ने बताया कि एक जनवरी को दोपहर दो बजे से साढ़े तीन बजे तक परिक्रमा स्थान पर ही राम नाम जप का कार्यक्रम बड़े पैमाने पर होगा। राम नाम जप आयोजन सीमाओं पर तैनात सैनिकों को ईश्वरीय शक्ति देने के लिए हो रहा है। चीन की सीमाओं पर हमारे सैनिक माइनस 50 डिग्री तापमान में तैनात रहते हैं तो राजस्थान के रेगिस्तान की सीमाओं पर सर्दी के दिनों में 50 डिग्री तापमान रहता है। सैनिकों को विषम परिस्थितियों में सीमाओं पर अपनी ड्यूटी देनी होती है। ऐसे में सैनिकों को आत्मबल के साथ-साथ ईश्वरीय शक्ति भी चाहिए। परिक्रमा स्थल पर नागरिकों के बैठने के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। इसी दिन राम नाम मंत्र परिक्रमा कार्यक्रम का समापन भी होगा। अजमेर में यह पहला अवसर है कि जब इतने बड़े स्तर पर राम नाम मंत्र का आयोजन किया गया है।
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शिक्षा मंत्री देवनानी फिलहाल जयपुर में ही करेंगे आराम।



दुर्घटना के बाद डॉक्टरों ने दी सलाह
अजमेर उत्तर क्षेत्र के भाजपा विधायक और प्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी फिलहाल जयपुर स्थित सरकारी आवास पर ही आराम करेंगे। 25 दिसम्बर की शाम को देवनानी जब जयपुर से अजमेर आ रहे थे तब उनकी सरकारी कार एक ट्रेलर से टकरा गए। हालांकि इस दुर्घटना में कोई खून खराबा नहीं हुआ लेकिन देवनानी ने अपने स्वास्थ्य की जांच जयपुर के एसएमएस अस्पताल में करवाई। प्राथमिक जांच के बाद चिकित्सकों ने देवनानी को सलाह दी है कि वे फिलहाल जयपुर में ही आराम करें। चिकित्सकों का कहना रहा कि देवनानी फिलहाल मानसिक तनाव और भागदौड़ वाला कार्य नहीं करें। चिकित्सकों की सलाह पर ही देवनानी जयपुर में आराम कर रहे हैं। देवनानी ने फिलहाल अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। देवनानी की कुशलक्षेम पूछने वालों का तांता लगा हुआ है।
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नरेन्द्र मोदी की दिलेरी की तो तारीफ होनी ही चाहिए । परिणाम की भगवान जाने।



पीएम नरेन्द्र मोदी 25 दिसम्बर को पाकिस्तान के लाहौर के निकट जट्टी उमरा में जिस दिलेरी के साथ पहुंचे उसकी तारीफ तो की ही जानी चाहिए। 24 दिसम्बर को मोदी रूस में थे और 25 को सुबह अफगानिस्तान के काबुल में आ गए। काबुल से ही मोदी ने पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई दी। इस पर शरीफ ने कहा कि दिल्ली जाने से पहले लाहौर में लंच लेते जाइए। बस फिर क्या था मोदी भारतीय वायु सेवा के विमान से लाहौर पहुंच गए। लाहौर में शरीफ ने गले लगाकर मोदी का इस्तकबाल किया और फिर हवाई अड्डे पर पहले से ही तैयार खड़े हैलीकॉप्टर में मोदी-नवाज बैठ गए। हैलीकॉप्टर उड़ा और लाहौर के निकट जट्टी उमरा में उतरा। यहां पर नवाज के परिवार का ऑलीशान रायविंड पैलेस है। इस पैलेस में नवाज की नातिन की शादी की मेहन्दी की रस्म भी चल रही थी। मोदी की आत्मीयता के साथ नवाज के परिवार ने सभी सदस्यों से मुलाकात की। मोदी नवाज ने मिलकर जन्मदिन का केक भी काटा। भारत और पाकिस्तान का मीडिया इस दौरे को लेकर आश्चर्यचकित रहा। दोनों देशों के मीडिया ने मोदी की दिलेरी की जमकर प्रशंसा की। पाकिस्तान को आतंकवादियों का गढ़ माना जाता है। शायद ही कोई दिन हो जब पाकिस्तान में आतंकी वारदात न हो। लाहौर के निकट जिस जट्टी उमरा क्षेत्र में मोदी गए उस क्षेत्र को हाफिज सईद का गढ़ माना जाता है। यह वहीं हाफिज सईद है जिसने मुम्बई हमले करवाए और आज भी भारत के खिलाफ जहर उगलता है। मोदी नवाज की इस आश्चर्यचकित मुलाकात के परिणाम क्या होंगे, यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन विपरीत परिस्थितियों में पाकिस्तान की सरजमीं पर उतर कर मोदी ने जबरर्दस्त दिलेरी दिखाई है। आमतौर पर जब भी कोई शासक किसी देश में जाता है तो एडवांस में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं लेकिन मोदी ने भारत से किसी सुरक्षाकर्मी को भेजे बगैर पाकिस्तान में उपस्थिति दर्ज करवा दी। भारत से रूस के लिए मोदी के साथ 120 सदस्यों का दल भी था। जब दल को पाकिस्तान जाने की खबर लगी तो कई सदस्यों की सांस ऊपर नीचे हो गई। तब मोदी ने ही सबको हिम्मत बंधाई। उधर जट्टी उमरा में रायविंड पैलेस में मोदी मेहन्दी की रस्म में शरीक हो रहे थे। इधर भारत में आलोचकों ने मोदी के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। विहिप के अन्र्तराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा ने कटाक्ष करते कहा कि अब दाऊद इब्राहीम और हाफिज सईद को मोदी अपने हवाई जहाज से बांधकर भी ले आएंगे। मोदी ने जिन हालातों में पाकिस्तान का दौरा किया उसे कोई भी सही नहीं मान रहा। हालांकि भाजपा के नेता दौरे का बचाव कर रहे हैं लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या अब सीमा पर गोलाबारी बंद हो जाएगी? क्या कश्मीर में आईएस के झंडे लहरना बंद हो जाएंगे? क्या देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकी वारदातें बंद हो जाएगी? क्या पाकिस्तान अब कश्मीर का राग अलापना बंद करेगा? मोदी जब चुनाव में पीएम पद के उम्मीदवार थे तब हर बार कहते रहे कि आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं हो सकती। मोदी को अब अपने देश में यह बताना होगा कि क्या पाकिस्तान सुधर गया है? एक ओर पीएम मोदी नवाज शरीफ की नातिन की शादी की मेहन्दी की रस्म में भाग ले रही हैं तो दूसरी ओर भारत में छोटी-छोटी बातों पर साम्प्रदायिक तनाव होते हैं। यदि दोनों देशों के नेताओं में इतने अच्छे संबंध हैं तो फिर भारत में हिन्दू और मुसलमान आमने सामने क्यों हो जाते हैं। अब तक का यह इतिहास रहा है कि जब भी दोनों देशों के नेता मिले हैं तो थोड़े ही दिनों बाद जोरदार तनाव हुआ है। आमतौर पर यह कहा जाता है कि पाकिस्तान में सेना का नियंत्रण है और वहां की निर्वाचित सरकार नाम मात्र की है। लेकिन 25 दिसम्बर को जिस तरह नवाज ने मोदी का इस्तकबाल किया उसमें नवाज की भी प्रशंसा की जानी चाहिए। मोदी को पाकिस्तान में बुलाकर नवाज ने भी यह संदेश दिया है कि वह कमजोर प्रधानमंत्री नहीं है।
(एस.पी. मित्तल)
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मसाणिया भैरव धाम के मनोकामना स्तंभ का तेरहवां वार्षिक समारोह धूमधाम से मना।



अजमेर जिल के निकट राजगढ़ स्थित मसाणिया भैरव धाम पर स्थापित मनोकामना स्तंभ का 13वां वार्षिक समारोह 25 दिसम्बर को धूमधाम से मना। मेरे लिए 25 दिसम्बर का दिन इसलिए खास रहा कि इस समारोह में मुझे भी हवन कुंड में आहूति देने और आरती करने का सुनहरा अवसर मिला। 13 वर्ष पहले जब भैरव धाम के उपासक चम्पालाल महाराज ने इस मनोकामना स्तंभ की स्थापना की थी, तब भी मैं उपस्थित था।
तब महाराज ने मुझसे कहा था कि मित्तल साहब एक दिन लाखों श्रद्धालु इस स्तंभ की परिक्रमा कर अपनी मनोकामना पूरी करेंगे। आज 25 दिसम्बर को मैंने अपनी आंखों से देखा कि एक लाख से भी ज्यादा श्रद्धालुओं ने 13वें वार्षिक समारोह के अवसर पर मनोकामना स्तंभ की परिक्रमा की है। पूरा राजगढ़ क्षेत्र श्रद्धालुओं से खचाखच भरा था। राजस्थान ही नहीं पड़ौसी राज्य हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भैरवधाम पर एकत्रित हुए। 13वें वार्षिक समारोह के मौके पर स्तंभ के सामने ही हवन यज्ञ किया गया। इस यज्ञ में केन्द्रीय उर्वरक एवं रसायन राज्यमंत्री निहालचंद मेघवाल के साथ-साथ राजस्थान के मंत्री कालूलाल गुर्जर, श्रीमती अनिता भदेल, राजकुमार रिणवा, विधायक सुरेश सिंह रावत, रामनारायण गुर्जर, श्रवणलाल, अजमेर के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, जिला प्रमुख वंदना नोगिया सहित अनेक प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी आदि ने आहूति दी। इस अवसर पर भैरवधाम के उपासक चम्पालाल महाराज ने कहा कि इस मनोकामना स्तंभ की परिक्रमा कर जो भी मांगा जाएगा वह मिलेगा। स्तंभ में मसाणिया भैरवधाम की शक्ति लगी हुई है। यहां असाध्य रोग ही दूर नहीं होते बल्कि घर परिवार में खुशहाली भी आती है। 
सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने का भी संकल्प:
मसाणिया भैरवधाम पर सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने का भी संकल्प करवाया जाता है। 25 दिसम्बर को भी सभी श्रद्धालुओं ने कन्या भ्रूण हत्या न करने का संकल्प लिया। महाराज ने सवाल उठाया कि जब हमें पत्नी, मां, बहन, दादी आदि चाहिए तो फिर बेटी क्यों नहीं? बेटी बचाने के लिए ही पिछले 6 माह से भैरवधाम पर संकल्प करवाया जा रहा है। अब तक दो लाख से भी ज्यादा श्रद्धालुओं ने कन्या भ्रूण हत्या न करने का संकल्प लिया है। नशा मुक्ति का संकल्प तो लगातार जारी है, बड़े स्तर पर शराब, अफीम, गुटखा आदि नश्ीाले पदार्थों का त्याग करने का संकल्प भैरवधाम पर करवाया जा रहा है। यदि कोई व्यक्ति बाबा के सामने संकल्प लेने के बाद फिर से नशा करने लगता है तो उसे बुरे परिणामों का सामना करना पड़ता है। 
मंत्री ने की प्रशंसा:
समारोह में केन्द्रीय मंत्री मेघवाल ने चम्पालाल महाराज के प्रयासों की प्रशंसा की। महाराज के चरणों में अपना सिर रखते हुए मेघवाल ने स्वीकार किया कि उन पर भी मसाणिया भैरवधाम की कृपा है। कन्या भ्रूण हत्या रोकने, नशा छुड़ाने आदि सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए सरकार अपनी ओर से प्रयास करती है। लेकिन मसाणिया भैरवधाम की पहल पर जो प्रयास होरहे हैं, वे बुहत प्रभावी है। उन्होंने कहा कि किसी धार्मिक स्थल पर संकल्प लेने का ज्यादा असर होता है। 
महाराज का सम्मान:
सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खादिम और अंजुमन कमेटी के पदाधिकारी सैय्यद मुन्नवर चिश्ती के नेतृत्व में खादिम समुदाय की ओर से महाराज का स्वागत सम्मान किया गया। इस मौके खादिम समुदाय ने महाराज के सिर पर पगड़ी बांधी और उन्हें शॉल ओढ़ाया। इस अवसर पर चिश्ती ने कहा कि सामाजिक बुराइयां किसी एक धर्म के लोगों की नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज की है। यह अच्छी बात है कि मसाणिया भैरवधाम पर सामाजिक बुराइयों को मिटाने के लिए संकल्प करवाया जाता है। पंजाब के एक दल ने भी महाराज को तलवार भेंट कर शानदार स्वागत किया।
(एस.पी. मित्तल)
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Thursday, 24 December 2015

हुड़दंग करने वाले सांसदों को वेतन तीन लाख तक बढ़ेगा।



देश की संसद में भले ही हमारे सांसद हुड़दंग करते रहे, लेकिन संसदीय कार्य मंत्रालय ने ऐसे सांसदों के वेतन और भत्ते तीन लाख रुपए तक बढ़ाने का प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इसे शर्मनाक ही कहा जाएगा कि जिन सांसदों ने पिछला वर्षाकालीन सत्र और वर्तमान का शीतकालीन सत्र चलने ही नहीं दिया। उनके वेतन और भत्ते बढ़ाने का प्रस्ताव आगामी बजट सत्र में रखा जाएगा। इस प्रस्ताव के मुताबिक सांसदों का वर्तमान वेतन पचास हजार रुपए प्रतिमाह से बढ़ाकर एक लाख रुपए तथा भत्तों में भी दुगनी वृद्धि का यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो हुड़दंग करने वाले सांसदों का प्रतिमाह 3 लाख रुपए तक मिलेंगे। इतना ही नहीं एक दूसरे प्रस्ताव में सांसदों का वेतन सरकारी अधिकारियों के वेतन से जोडऩे का है। यानि जब जब भी सरकार के वेतन भोगी कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ेगी तब अपने आप सांसदों का भी वेतन बढ़ जाएगा। इस प्रस्ताव में पीएम नरेन्द्र मोदी को भी लालच दिया गया है। इसके मुताबिक केन्द्र सरकार के केबिनेट सचिव के वेतन से डेढ़ गुना ज्यादा वेतन पीएम को दिया जाना है। सांसदों को सचिव के वेतन से एक हजार रुपए और मंत्रियों को दुगना वेतन दिए जाने का प्रावधान है। अब सवाल उठता है कि क्या हुड़दंग करने वाले सांसद किसी वेतन भत्ते के अधिकारी हैं,जब कर्मचारी हड़ताल करते हैं तो सरकार हड़तालियों को अनुपस्थित मानकर वेतन नहीं देती। क्या यह नियम सांसदों पर लागू नहीं होता? पूरा देश देख रहा है कि कांग्रेस के 44 सांसदों ने लोकसभा के दो सत्र बर्बाद कर दिए। सवाल सिर्फ कांग्रेस का ही नहीं है। इसमें भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों के सांसद शामिल है। यूपीए के शासन को भाजपा के सांसदों ने भी कई दिनों तक हुड़दंग कर संसद को ठप कर दिया। जिन छोटे राजनीतिक दलों के पांच दस सांसद हैं वे भी संसद में खड़े होकर हुड़दंग करते हैं तो संसद को स्थगित कर दिया जाता है। जब संसद का यह हाल है तो फिर सांसदों को वेतन क्यों दिया जाए? अच्छा होता कि सांसद ऐसा प्रस्ताव पास करते जिसमें हुड़दंग करने वाले सांसद का न केवल वेतन काटा जाता, बल्कि उसे सम्पूर्ण सत्र से निलंबित कर दिया जाता। लालची सांसदों को यह समझना चाहिए कि जो वेतन और भत्ते तथा सुविधाएं वे भोगते हैं, वह इस देश की गरीब जनता से टैक्स के रूप में वसूला जाता है। आज आम नागरिक सरकार के टैक्स के बोझ से दवा पड़ा है और सांसद अपना वेतन बढ़ाने की फिराक में हैं। नरेन्द्र मोदी ने पीएम पद की शपथ लेने के बाद संसद में कहा था कि वे संसद में आवश्यक सुधार करेंगे। लेकिन दो वर्ष की अवधि में नरेन्द्र मोदी को भी यह पता चल गया कि जनता के वोट से सांसद बनने वाले व्यक्ति जनसेवक नहीं बल्कि जनता का खून चूसने वाले है। एक ओर नरेन्द्र मोदी स्वयं को प्रधान सेवक होने का दावा करते हैं तो दूसरी ओर उन्हीं की सरकार का मंत्रालय पीएम पद के वेतन को केबिनेट सचिव के वेतन से जोडऩे का प्रस्ताव रख रहा है। यदि इस मुद्दे पर आम नागरिक की राय ली जाए तो मेरा दावा है कि एक भी नागरिक सांसदों का वेतन बढ़ाने के पक्ष में अपनी राय नहीं देगा। लेकिन हम सब जानते हैं कि संसद में जब वेतन भत्ते बढ़ाने का प्रस्ताव आएगा तो लालची सांसद तुरंत मंजूर कर लेंगे। 
(एस.पी. मित्तल)
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लगने वाला है आर.के. मार्बल को झटका।



पीरदान दम्पत्ति अपना अनशन खत्म करें। 
केन्द्र सरकार मार्बल पत्थर को विदेशों से आयात करने की छूट देने जा रही है। फिलहाल लाइसेंसधारी ही विदेशों से मार्बल आयात कर रहे हैं। देश में आयात का सबसे बड़ा लाइसेंस अजमेर के किशनगढ़ उपखंड के आर.के. मार्बल संस्थान के पास है। यदि अगले कुछ ही दिनों मे केन्द्र सरकार आयात की छूट का आदेश जारी करती है तो इसका सबसे बड़ा झटका आर.के.मार्बल को ही लगेगा। चूंकि आर.के. मार्बल ही देश में सबसे ज्यादा आयात कर रहे है। इसलिए पूरे मार्बल उद्योग पर आर.के.मार्बल का एकाधिकार है। छोटे व्यापारी भी चाहते हैं कि मार्बल का आयात करें, लेकिन केन्द्र सरकार की शर्तों के कारण लाइसेंस नहीं ले पाते। जिस व्यापारी का तीन वर्ष में पांच करोड़ रुपए का कारोबार है, वही व्यापारी लाइसेंस ले सकता है। लेकिन जब सरकार लाइसेंस प्रणाली को खत्म कर आयात की छूट दे देगी तो छोटा व्यापारी भी विदेशों से मार्बल मंगाकर बेच सकता है। देश का 90 प्रतिशत मार्बल राजस्थान की खानों से ही निकलता है, लेकिन खानो से निकलने वाले मार्बल की लागत लगातार बढ़ रही है तथा क्वालिटी के मुकाबले में राजस्थान का मार्बल विदेशी मार्बल के सामने कमजोर है। घरेलू बाजार में मार्बल की मांग लगातार घट रही है, क्योंकि अब नया मकान बनाने वाले टाइल्स का उपयोग कर रहे हैं। दुनिया में भारत के अलावा इटली और ईरान में मार्बल का उत्पादन होता है। वियतनाम में तो आर.के. मार्बल के मालिक अशोक पाटनी, सुरेश पाटनी और विमल पाटनी ने खाने ले रखी हैं यानि आर.के. मार्बल के मालिक तो वियतनाम की अपनी खानों का पत्थर दुनियाभर में बेचते हैं। 
आर.के. मार्बल की ज्यादतियों के विरोध में पीरदान सिंह राठौड़ और उनकी पत्नी श्रीमती कैलाश कंवर गत 10 दिसम्बर से अजमेर के कलेक्ट्रेट के फुटपाथ पर आमरण अनशन पर बैठी हैं। बीच में मरने की नौबत आई तो कैलाश कंवर को पुलिस जबरन उठाकर अस्पताल ले गई, लेकिन अस्पताल में चार दिन रहने के बाद कैलाश कंवर फिर से अपने पति के साथ आरमण अनशन पर बैठ गई। 24 दिसम्बर को पीरदान दम्पत्ति के आमरण अनशन के 15 दिन पूरे हो गए, लेकिन इसे संवेदनहीनता ही कहा जाएगा कि सरकार के किसी भी प्रतिनिधि ने राठौड़ दम्पत्ति से संवाद नहीं किया। इस बीच राठौड़ दम्पत्ति के अनशन को लगातार जनसमर्थन मिल रहा है। 24 दिसम्बर को राठौड़ दम्पत्ति ने एक बार फिर घोषणा की है कि उनके मामलों की जांच सीबीआई से करवाई जाए। जब तक सीबीआई जांच की घोषणा नहीं होती है, तब तक अनशन जारी रहेगा। भले ही कलेक्टे्रट के फुटपाथ पर उनका दम निकल जाए। सरकार की संवेदनहीनता से खफा होकर ही पीरदान ने अपने बच्चों से कहा है कि उनके शवों को मृत जानवरों को उठाने वाले वाहनों में रखकर मेडिकल कॉलेज पहुंचा दिया जाए। यानि राठौड़ दम्पत्ति अपनी जान देने पर तुले हुए हैं। 24 दिसम्बर को एक बार फिर मैंने कलेक्ट्रेट के फुटपाथ पर पीरदान जी से मुलाकात की। हालात को देखते हुए मैंने उनसे अपील की है कि वे अपना अनशन खत्म करें और इस निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष जारी रखें। 
पीरदान दम्पत्ति के चले जाने से भी इस निरंकुश शासन पर कोई असर पडऩे वाला नहीं है। सवाल पीरदान के आरोपों के सही या गलत होने का नहीं है। बल्कि मानवीय संवेदनाओं का है। लोकतंत्र के इस दौर में जब एक दम्पत्ति 15 दिन से आमरण अनशन पर है तो क्या सरकार के किसी जनप्रतिनिधि का यह दायित्व नहीं बनता कि वह संवाद करें। जहां तक आर.के.मार्बल का सवाल है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि धन बल के बूते आर.के. मार्बल के मालिकों  की सत्ता को चुनौती देना आसान नहीं है, लेकिन राठौड़ दम्पत्ति पर हो रहे जुल्मों पर ईश्वर का न्याय अपनी जगह है। पिछले दिनों आयकर विभाग ने आर.के. मार्बल  की संस्थानों पर एक साथ छापामार कार्यवाही की। इसके बाद अब जब केन्द्र सरकार आयात की छूट देने जा रही है तो सबसे बड़ा झटका आर.के. मार्बल को ही लगेगा। पीरदान जी को ईश्वर के इस न्याय पर भरोसा रखना चाहिए। जब न्याय और अन्याय की जांच का काम ईश्वर खुद कर रहा है तो फिर पीरदान जी को निरंकुश शासन में किस जांच की क्या आवश्यकता है? मेरा मानना है कि जब जब ईश्वर न्याय करता है तो सजा बहुत सख्त मिलती है। पीरदान को जिंदा रहकर अत्याचारियों के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखना चाहिए। 
(एस.पी. मित्तल)
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Wednesday, 23 December 2015

स्मार्ट सिटी का भट्टा, भ्रष्टाचार से बना अजमेर का मास्टर प्लान ही बैठाएगा।



पीएम नरेन्द्र मोदी और सीएम वसुंधरा राजे ने अजमेर को स्मार्ट सिटी बनाने का जो सपना संजोया है, उसका भट्टा भ्रष्टाचार से बना मास्टर प्लान ही बैठाएगा। 22 दिसम्बर को अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष हेमंत गेरा ने जनप्रतिनिधियों के साथ एक बैठक कर प्रस्तावित मास्टर प्लान पर सुझाव मांगे। जनप्रतिनिधियों ने अपने नजरिए से सुझाव भी दिए, लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि का ध्यान भ्रष्टाचार से बने मास्टर प्लान की ओर गया ही नहीं। जिस मास्टर प्लान पर सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हैं। उसे एक प्राइवेट कंपनी में तैयार किया है। मास्टर प्लान के प्रारूप को देखने से साफ पता चलता है कि कंपनियों के अधिकारियों ने ईमानदारी के साथ काम नहीं किया। प्रारूप में कंपनी को अजमेर शहर और आसपास के क्षेत्र की वास्तविक स्थिति दिखानी चाहिए थी, लेकिन कंपनी ने भ्रष्टाचार की वजह से अपने नजरिए से मास्टर प्लान तैयार कर लिया। अजमेर के पेरोफेरी क्षेत्र में 118 गांवों को शामिल किया गया है। इन गांवों को एक मुश्त रुरल बेल्ट दिखा दिया गया है, जबकि मौके पर वाणिज्य गतिविधियों के साथ-साथ अनेक आवासीय कॉलोनियां विकसित हो गई है। पेराफेरी क्षेत्र के जनप्रतिनिधि पिछले कई वर्षों से आबादी क्षेत्र घोषित करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन इनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जमीनों के जिन जानकारों ने मास्टर प्लान बानने वाली कंपनी के अधिकारियों से सम्पर्क किया तो मास्टर प्लान में कृषि भूमि को भी वाणिज्य दर्शा दिया गया है। इससे ज्यादा और क्या मजाक होगा कि परबतपुरा क्षेत्र में जहां ऑटो मोबाइल हब बना हुआ है, उसे मास्टर प्लान में औद्योगिक क्षेत्र बताया गया है। इसी प्रकार खाली पड़ी भूमि को ऑटो मोबाइल क्षेत्र दर्शाया गया है। जिस भूमि को ओसीएफ बताया गया है, वहां पहले से ही कोमर्शियल गतिविधियां चल रही है। 
यह अच्छी बात है कि प्राधिकरण के अध्यक्ष हेमंत गेरा ने जनप्रतिनिधियों से सुझाव मांगे, लेकिन अच्छा होता कि अजमेर के जनप्रतिनिधि मास्टर प्लान बनाने वाली कंपनी के भ्रष्टाचार का भी मुद्दा उठता। यदि मास्टर प्लान के प्रारूप की जांच करवाई जाए तो बहुत बड़ा भ्रष्टाचार सामने आ सकता है। पीएम मोदी और सीएम राजे जब अजमेर को स्मार्ट सिटी बनाने जा रहे है, तो यह जरूरी है कि अजमेर की वर्तमान स्थिति को सामने लाया जाए। ऐसा नहीं हो सकता कि 118 गांवों को रुरल बेल्ट बताकर हकीकत को छिपाया जाए। जब तक पेराफेरी के 118 गांवों के बारे में कोई स्पष्ट स्थिति नहीं आएगी, तब तक अजमेर स्मार्ट सिटी नहीं बन सकता है। जहां तक शहरी क्षेत्र का सवाल है तो सड़कों की चौड़ाई वर्तमान स्थिति को देखकर निर्धारित की जानी चाहिए। इस मामले में अजमेर शहर के दोनों भाजपा विधायक वासुदेव देवनानी और श्रीमती अनिता भदेल को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ेगी। यदि ये दोनों विधायक राजनीतिक कारणों से आपस में ही उलझते रहे तो फिर पीएम और सीएम का स्मार्ट सिटी का सपना सपना ही रह जाएगा। अजमेर शहर के विकास के लिए ही दोनों विधायकों को स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री भी बनाया गया है, लेकिन इसे अजमेर की जनता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देवनानी और भदेल में मित्रता के बजाए दुश्मनी है। हालात इतने खराब है कि दोनों मंत्री एक साथ किसी समारोह में शामिल होने से भी बचते है। सवाल उठता है कि जब सत्तारुढ़ पार्टी के मंत्री है, एकजुट नहीं है तो फिर अजमेर स्मार्ट कैसे बनेगा। जहां तक अफसरों का सवाल है तो अफसर तो आते जाते रहते हैं। खुद हेमंत गेरा प्राधिकरण के कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। ऐसे में गेरा की कितनी रुचि होगी। इसे समझा जा सकता है। संभागीय आयुक्त का पद पिछले चार माह से रिक्त पड़ा हुआ है। अजमेर की कलेक्टर डॉ. आरुषि मलिक ही संभागीय आयुक्त का काम कर रही है। 

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अरुण जेटली पर आरोप लगाने का फायदा शिवराज और वसुंधरा को हुआ



केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे, उसका सबसे ज्यादा फायदा एमपी के सीएम शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे को हुआ है। व्यापमं घोटाले में शिवराज और ललित मोदी प्रकरण में वसुंधरा राजे जो पर इस्तीफे की जो तलवार लटकी हुई थी उसे अरूण जेटली पर लगे आरोपों ने हटा दिया है। पीएम नरेन्द्र मोदी ने अब कहा है कि कांग्रेस हमारे मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर झूठे आरोप लगा रही है। जेटली पर आरोप लगने के बाद पीएम मोदी ने एक ही झटके में दोनों मुख्यमंत्रियों और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पाक साफ घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं पीएम मोदी ने भाजपा सांसदों को निर्देश दिए है कि अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर कांग्रेस के नेताओं के भ्रष्टाचार की पोल खोले। इसके अंतर्गत जनवरी माह में भाजपा सांसदों को एक रात अपने निर्वाचन क्षेत्र की विधानसभाओं में गुजारनी है। फरवरी में सांसद अपने पड़ोसी जिले में जाकर कांग्रेस की पोल खोलेगी। जिन जिलों में भाजपा के निर्वाचित सांसद नहीं है वहां भाजपा के राज्य सभा के सांसद जाएंगे। पीएम मोदी को लगता है कि यदि कांग्रेस के नेताओं के भ्रष्टाचार उजागर किए जाए तो भाजपा नेताओं पर लगे आरोप अपने आप कमजोर साबित हो जाएंगे।

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अजमेर रेलवे स्टेशन पर पृथ्वीराज चौहान की वीरता और कबीर के दोहे नजर आएंगे।



केन्द्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने अजमेर रेलवे स्टेशन को हेरिटेज लुक देने की स्वीकृति दे दी है। चूंकि अजमेर का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व है, इसलिए यहां के रेलवे स्टेशन को ऐसा हेरिटेज लुक दिया जाएगा, जिसे देखकर यहां आने वाला हर व्यक्ति अपने मन में अमिट छाप लेकर जाए। जिला कलेक्टर डॉ. आरुषि मलिक ने बताया कि हेरिटेज लुक के अंतर्गत प्लेट फार्म की दीवारों पर चन्द बरदाई द्वारा लिखे गए पृथ्वीराज रासो महाग्रंथ की पंक्तियां और कबीर दास के दोहे अंकित किए जाएंगे। इसके साथ ही किशनगढ़ शैली की चित्रकारी भी दीवारों पर चित्रित की जाएगी। इसके लिए कलाकारों की एक टीम बनाई गई है। इस टीम में जहां हेरिटेज के विशेषज्ञ शामिल है,वहीं सुप्रसिद्ध राजस्थानी साहित्यकार पद्मश्री चन्द्र प्रकाश देवल को भी शामिल किया गया है। यह टीम आगामी 28 दिसम्बर को अजमेर रेलवे स्टेशन परिसर का दौरा करेगी। इस योजना का व्यय अजमेर विकास प्राधिकरण करेगा। डॉ. मलिक ने बताया कि रेलवे स्टेशन को हेरिटेज लुक देने में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने व्यक्तिगत रुचि दिखाई है। मुख्यमंत्री ने ही केन्द्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु से वार्ता कर स्वीकृति प्रदान करवाई। उन्होंने बताया कि स्टेशन परिसर को स्वचछ बनाए रखने के लिए रेल प्रशासन के साथ मिलकर प्रभावी कार्यवाही की जाएगी। 

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Tuesday, 22 December 2015

आखिर डंडे की भाषा ही समझती है संसद।



जिस राज्यसभा में पिछले सात माह से जुवेनाइल जस्टिस बिल लंबित पड़ा था, उसी राज्यसभा में 22 दिसम्बर को इस बिल को स्वीकृत करने के कगार पर ला दिया। इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या हमारी संसद भी डंडे की भाषा ही समझती है। बहुचर्चित निर्भया गैंग रेप में 20 दिसम्बर को जब मुख्य आरोपी नाबालिग होने का वास्ता देकर मात्र तीन साल में जेल से बाहर आ गया तो देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर जनआंदोलन उफान पर आ गया। जिन सांसदों ने राज्यसभा में इस बिल को लटका रखा था, उन्हें शर्म आनी चाहिए थी कि निर्भया की मां भी इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गई। सांसदों को शर्म महसूस हो इसके लिए एक मां ने अपनी उस बेटी की पहचान भी उजागर कर दी, जिसके साथ बेरहमी से गैंगरेप हुआ था। सवाल राज्यसभा में भाजपा और कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों का नहीं है। सवाल तो यही है कि राज्यसभा में इस बिल को मंजूरी नहीं मिली। यह भी माना कि यदि बिल मंजूर हो जाता, तब भी निर्भया का बलात्कारी जेल से रिहा ही होता, लेकिन बाद में तो इस बिल का प्रभाव पड़ता ही। बिल जब मंजूर हो जाएगा, तभी तो कानून बनेगा। इस मामले में निर्भया की निडर मां को शाबासी मिलनी चाहिए कि उसने जनआंदोलन से जुड़कर संसद पर जो दबाव बनाया, उसी का नतीजा रहा कि 22 दिसम्बर को राज्यसभा में अधिकांश सांसदों ने संशोधित बिल पर अपना समर्थन जताया। यह सही है कि यदि निर्भया की मां डंडा लेकर इंडिया गेट पर नहीं बैठती तो यह बिल राज्यसभा में यूं ही पड़ा रहता। इस बिल को भाजपा सांसद शांताकुमार ने प्रस्तुत किया। बिल में यह प्रावधान किया गया कि नाबालिग की उम्र 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष कर दी जाए। लेकिन इस बिल को कांग्रेस के सांसद आनंद शर्मा ने सलेक्ट कमेटी में भिजवा दिया। फलस्वरूप बिल आगे बढ़ ही नहीं सका। यदि सात माह पहले यह बिल मंजूर हो जाता तो इस अवधि में अनेक अपराधियों को सजा मिल सकती थी। जो कांग्रेस राज्य सभा में लगातार हंगामा कर रही थी, उसने भी 22 दिसम्बर को बिल पर अपनी सहमति जतार्ई। राज्यसभा में कांग्रेस के नेता गुलामनबी आजाद ने हंसते हुए कहा कि भले ही सरकार से हमारे मतभेद हैं, लेकिन फिर भी इस बिल का हम समर्थन कर रहे हैं। आजाद के इस बयान से साफ प्रतीत होता है कि यदि निर्भया की मां का डंडा नहीं होता तो 22 दिसम्बर को भी राज्यसभा में कांग्रेस इस बिल का समर्थन नहीं करती। 
विरोध में तर्क:
नाबालिग की उम्र 18 से घटाकर 16 करने के विरोध में भी राजनेताओं ने तर्क दिए हैं। यहां तक कि महिला सांसदों ने भी कहा कि यह समस्या का समाधान नहीं है। अपराधी की कोई उम्र नहीं होती है। आज 18 से 16 वर्ष उम्र की जा रही है और जब 16 वर्ष से कम उम्र का युवा कोई अपराध करेगा तो क्या नाबालिग होने की उम्र को 16 वर्ष से भी कम कर दिया जाएगा? महिला सांसदों का कहना था कि उम्र घटाने के बजाए पुरुषों खासकर युवाओं की मानसिकता में बदलाव किया जाना है। ऐसा क्यों होता है कि जब किसी लड़की को अकेला और असहाय देखा जाता है तो युवा गंदी निगाह से देखते हैं। महिला सांसदों का कहना रहा कि घर परिवार का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि जिसमें लड़कों को अच्छी शिक्षा दी जा सके। लड़कों को इस बात का भी अहसास होना चाहिए कि उनके परिवार में भी मां, बहन, भाभी, पत्नी आदि के रूप में महिलाए हैं। 

(एस.पी. मित्तल)
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वाल्मिकी समाज के 38 जोड़ों का होगा सामूहिक विवाह



वाल्मिकी समाज के 38 जोड़ों का सामूहिक विवाह 25 दिसम्बर को अजमेर के पटेल मैदान पर होगा। आयोजन समिति के प्रवक्ता प्रताप सनकत ने बताया कि यह पहला अवसर है, जब विवाह से पूर्व वर और वधू के बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक कर दी गई है। सामूहिक विवाद सम्मेलन का जो निमंत्रण पत्र वितरित किया गया है, उसमें सभी 38 जोड़ों का विवरण है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि समाज के लोग अच्छी तरह जांच पड़ताल और मिलान कर लें। सनकत ने बताया कि सामूहिक विवाह सम्मेलनों के बाद परिवारों को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसी संभावनाओं को समाप्त करने के लिए इस बार नया प्रयोग किया गया है। 25 दिसम्बर को स्टेशन रोड स्थित किंग एडवर्ड मेमोरियल गेस्ट हाउस से 38 दुल्हों की बारात प्रात: 7 बजे शुरू होगी। यह बारात मदारगेट, चूड़ी बाजार, नया बाजार, आगरा गेट, सूचना केन्द्र होते हुए पटेल मैदान पर पहुंचेगी। दुल्हों के अभिभावकों से कहा गया है कि वे प्रात: 6:30 बजे गेस्ट हाऊस पहुंचे तथा दुल्हनों को पटेल मैदान पर पहुंचने के लिए कहा गया है। समाज के पंचगण इस बात का भी ध्यान रखेंगे कि सामूहिक विवाह में कोई अड़चन न हो। विवाह की धार्मिक रस्मों के अवसर पर उमेश नाथ महाराज और मसाणिया भैरव धाम के उपासक चम्पालाल महाराज आशीर्वाद देंगे। 

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Monday, 21 December 2015

देश को आज राम नाम की जरूरत है अजमेर में 51 अरब राम नाम मंत्र की परिक्रमा शुरू


पूर्व केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री और हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद महाराज ने कहा है कि भारत को आज राम नाम मंत्र की जरूरत है। देश में व्याप्त संकटों और समस्याओं का समाधान इसी राम नाम मंत्र की ताकत से किया जा सकता है।
21 दिसम्बर को यहां आजाद पार्क में बनाई गई अयोध्या नगरी में 51 अरब राम नाम मंत्रों की पुस्तकों की परिक्रमा के शुभारंभ समारोह में स्वामी चिन्मयानंद ने कहा कि रावण को भी अपनी ताकत का घमण्ड था, लेकिन जब समुन्द्र में राम नाम के पत्थर तैरने लगे तो रावण का घमण्ड चूर-चूर हो गया। इसके बाद देश को आजाद करवाने में महात्मा गांधी ने भी राम नाम का सहारा लिया। रघुपति राघव राजा राम का नारा देकर महात्मा गांधी ने देशवासियों को एकजुट किया और देश से विदेशी शासकों को भगाया। महात्मा गांधी भी राम नाम की ताकत को समझते थे। आज वर्तमान दौर में भी राम नाम की सख्त जरूरत है। नरेन्द्र मोदी का नाम लिए बगैर चिन्मयानंद ने कहा कि वर्ष 2012 में प्रयाग में देश के साधु-संतों का सम्मेलन हुआ। उसमें जिस व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया, उसी के अनुरुप देश में आज शासन चल रहा है। राम नाम के बल की वजह से ही देश में एक ऐसी सरकार चल रही है, जिस पर करोड़ों लोगों का भरोसा है। राम नाम के दम पर ही रामजन्म भूमि का आंदोलन चला था। चिन्मयानंद ने अपना एक संस्मरण सुनाते हुए बताया कि अजमेर में जब वर्ष 89 में संत रामसुखदास महाराज का चातुर्मास चल रहा था तब मुझे यह दायित्व दिया गया कि रामसुखदास महाराज का समर्थन रामजन्म भूमि आंदोलन को दिलवाया जाए। तब मैंने अजमेर की ही इस धरती पर रामसुखदास महाराज से मुलाकात की और उन्हें रामनाम का भरोसा दिलाकर आंदोलन के लिए समर्थन करवाया। इन दिनों राजस्थान में अकाल के हालात थे। यह राम नाम की ही ताकत थी कि जिस दिन मैंने चातुर्मास समारोह में अपना प्रवचन दिया, उसी समय तेज वर्षा भी हुई।
राम नाम में ही है सत्य :
चिन्मयानंद ने कहा कि सत्य को जानने के लिए दुनियाभर में प्रयोग हुए लेकिन भारतीय संस्कृति में राम नाम में ही सत्य है। उन्होंने कहा कि आज देश में जो अंधकार है उसे राम नाम से ही दूर किया जा सकता है। अजमेरवासियों का यह सौभाग्य है कि यहां 51 अरब राम नाम की पुस्तकें रखी गई हैं और लोग उसकी परिक्रमा कर रहे है।
तीन नहीं एक शब्द ही काफी है :
समारोह में सन्यास आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी शिव ज्योतिषानंद महाराज ने राम नाम की महिमा बताते हुए कहा कि एक बार एक पीडि़त व्यक्ति कबीर दास जी के घर गया। घर पहुंचने पर पता चला कि कबीरदास बाहर गए हैं और तीन दिन बाद लौटेंगे। इस पर कबीर दास के पुत्र कमाल खान ने परेशानी जानना चाहा तो पीडि़त व्यक्ति ने कहा कि उसे जो परेशानी है उसका समाधान कबीरदास जी ही कर सकते है। इस पर कमाल खान घर के अंदर गया और एक कागज पर कुछ लिखकर पीडि़त व्यक्ति को दे दिया। कमाल का कहना रहा कि इस पर्ची को घर में रखने से ही समस्या का समाधान हो जाएगा। तीन दिन बाद जब कबीरदास जी लौटे तो कमाल ने बताया कि पीडि़त व्यक्ति को जो पर्ची दी थी उस पर तीन बार राम नाम लिखा गया था। इस पर कबीरदास जी ने कहा कि तूने एक व्यक्ति की समस्या के समाधान के लिए राम का नाम तीन बार क्यों लिखा? उसकी समस्या तो एक बार राम लिखने से ही समाप्त हो जाती। स्वामी शिव ज्योतिषानंद ने कहा कि आज तो 51 अरब राम नाम शब्द लिखे हुए है जिनकी परिक्रमा की जा रही है।
शिव ने भी गाई महिमा :
समारोह में पुष्कर स्थित चित्रकूट धाम के अधिष्ठाता पाठक जी महाराज ने कहा कि भगवान शिव ने भी राम की महिमा गाई है। गणेशजी ने भी राम नाम की परिक्रमा की थी इसलिए आज गणेशजी सबसे पहले पूजे जाते है। उन्होंने कहा कि 51 अरब राम नाम की परिक्रमा कर लेने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।
सवा लाख का संकल्प :
राजगढ़ स्थित मसाणिया भैरव धाम के उपासक चम्पालाल जी महाराज ने कहा कि 51 अरब राम नाम के महोत्सव के अवसर पर वे अपने राजगढ़ स्थित भैरव धाम पर सवा लाख लोगों से कन्या भ्रूण हत्या न करने का संकल्प दिलवाएंगे। उन्होंने कहा कि उन पर तो हमेशा से ही भगवान राम की कृपा रही है और इसलिए आज भैरव धाम पर लाखों श्रद्धालु आते हैं।
महोत्सव का ले आनंद :
समारोह के संयोजक सुनील दत्त जैन ने कहा कि श्रद्धालु आगामी एक जनवरी तक राम नाम मंत्रों की परिक्रमा प्रात: 8:30 बजे से रात 8 बजे तक कर सकते है। अयोध्या नगरी में परिक्रमा सुविधाजनक तरीके से हो सके इसके लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। उन्होंने माना कि अब आगामी एक जनवरी तक अजमेर का माहौल राममय होगा। परिक्रमा के साथ-साथ धार्मिक आयोजन भी प्रतिदिन होंगे। दोपहर 3:30 बजे से सुंदरकांड का पाठ तथा सायं 6 बजे महाआरती होगी। प्रतिदिन साधु-संतों के धार्मिक प्रवचन तथा अन्य आयोजन लगातार होंगे। समारोह में स्कूली शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी, नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, अखिल भारतीय माहेश्वरी सेवा सदन के अध्यक्ष श्यामसुंदर बिडला, समाजसेवी सुभाष काबरा, कंवल प्रकाश किशनानी, उमेश गर्ग आदि ने भी विचार प्रकट किए। समारोह का सफल संचालन श्रीमती वृतिका शर्मा ने किया।
एक लाख पुस्तके हैं :
51 अरब राम नाम मंत्रों का संकलन श्री मानव मंगल सेवा न्यास के माध्यम से किया गया है। न्यास के प्रमुख बालकृष्ण पुरोहित ने बताया कि 51 अरब राम नाम एक लाख चार पुस्तिका में लिखे गए हैं। न्यास की ओर से श्रृद्धालुओं को पुस्तिका नि:शुल्क दी जाती है और फिर जब राम नाम लिख दिए जाते है तो फिर एकत्रित भी न्यास के कार्यकर्ता ही करते हैं। यह काम पिछले 15 वर्षो से लगातार चल रहा है। मान्यता है कि राम नाम के शब्दों की परिक्रमा करने में पशुओं का जीवन भी उज्जवल हो जाता है। उन्हें इस बात का संतोष है कि राम नाम मंत्रों की परिक्रमा बड़े स्तर पर आयोजित की गई है।
(एस.पी. मित्तल)
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Sunday, 20 December 2015

जिंदा रहने के लिए प्रकृति की पूजा करनी ही पड़ेगी-स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज।


द्वारकापीठ और जोशी मठ के शंकराचार्यस्वामी स्वरूपानंद महाराज के परम शिष्य स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज ने कहा है कि जिस तरह प्राकृतिक वातावरण बिगडऩे को लेकर दुनिया भर में चिंता व्यक्त की जा रही है, उसमें यदि मनुष्य को जिंदा रहना है तो प्रकृति की पूजा करनी ही पड़ेगी। स्वामी प्रज्ञानानंद नागौर जिले के मकराना कस्बे में श्रीमद्भागवत कथा का वाचन कर रहे हैं। 15 दिसम्बर से शुरूहुई कथा का समापन 22 दिसम्बर को होगा। 20 दिसम्बर को राजस्थान राजस्व मंडल के सदस्य एल.डी.यादव, प्रदेश के पूर्व संसदीय सचिव ब्रह्मदेवकुमावत, बिजयनगर नगर पालिका के अध्यक्ष सचिन सांखला, समाजसेवी विष्णु चौधरी आदि के साथ मैंने भी ज्ञान से भरी कथा को सुना। भारतीय आध्यात्म को आज के विज्ञान से जोड़ते हुए स्वामी प्रज्ञानानंद ने कहा कि आज जब हमने पूरे वातावरण को अपने स्वार्थों के लिए दूषित कर दिया है, तब हमें अपने जिंदा रहने की चिंता सताने लगी है। 
कहा जा रहा है कि देश की राजधानी दिल्ली में तत्काल उपाय नहीं किए गए तो दिल्लीवासियों का जिंदा रहना मुश्किल हो जाएगा। देश की सर्वोच्च न्यायालय भी हस्तक्षेप कर रही है। स्वामी जी ने कहा कि यह सब इसलिए हुआ है कि हमने प्रकृति का सम्मान नहीं किया। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजा के योग्य माना गया। जबकि मनुष्य ने अपने भोग के लिए प्रकृति का दुरुपयोग किया हैै। अब धार्मिक स्थलों पर लोग श्रद्धा के साथ नहीं बल्कि पर्यटन के लिए जाते हैं। हमारी संस्कृति आध्यात्म से जुड़ी है,जो हमें प्रकृति की पूजा करने की शिक्षा देती है। भगवान श्रीकृष्ण ने तब गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की सीख दी, तो गाय को माता माना। आज भी यदि दुनिया भारतीय संस्कृति के अनुरूप प्रकृति की पूजा करने लगे तो हम इस जानलेवा संकट से बच सकते हैं। उन्होंने ने कहाकि वर्तमान समय में जो उपाय किए जा रहे है, उनसे कोई हल निकलने वाला नहीं है। स्वामी जी ने कहा कि हो यह रहा है कि हम जीने की कला सीख रहे है, जबकि हमें छोडऩे की कला सीखनी चाहिए। हमने अपने विलासितापूर्ण जीवन के लिए बहुत से कृतिम साधन एकत्रित कर लिए हैं। हमें इन कृत्रिम साधनों का भी त्याग करना होगा। मनुष्य के जीवन में आवश्यकताएं जितनी कम होंगी,उसका जीवन उतना ही सरल और आनंदमय होगा। स्वामी जी ने कहा कि हमें प्रकृति की पूजा के साथ साथ अपने माता-पिता का भी सम्मान करना चाहिए। जिन परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता की सेवा की जाती है, उन परिवारों को कभी भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। स्वामी ने मुकुट बिहारी लाल नाठा, श्रीमती पुष्पा देवी नाठा के परिवार की सराहना करते हुए कहा कि यह परिवार अपने पूर्वज रामचन्द नाठा व चन्द्र देवी नाठा के पावन स्मरण में भागवत कथा का आयोजन करवा रहा हैं। परिवार के सदस्यों का श्रद्धाभाव दिखाता है कि इस परिवार में बुजुर्ग सदस्यों का कितना मान सम्मान होता है। 

(एस.पी. मित्तल)
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सांसदों की वजाह से होगा निर्भया का बलात्कारी रिहा।


देश के बहुचर्चित निर्भया बलात्कार कांड का मुख्य आरोपी 20 दिसम्बर को जेल से रिहा हो गया। इसके साथ ही दिल्ली में इंडिया गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू हो गया है। निर्भया के माता-पिता भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हैं। इस आरोपी ने तीन वर्षपहले निर्भया के संग बलात्कार किया था। तब यह नाबालिग था। इसी वजह से मात्र तीन वर्ष की सजा ही बलात्कारी को मिल पाई। बलात्कार के आरोपी को नाबालिग होने का लाभ न मिले इसको लेकर संसद में एक बिल लम्बित है। यदि यह बिल कानून बन जाता तो निर्भया का बलात्कारी जेल से बाहर नहीं आ पाता। पूरा देश देख रहा है कि संसद के दोनों सदनों में पिछले सात माह से हंगामा हो रहा है। हंगामे की वजह से पहले वर्षाकालीन सत्र व अब शीत कालीन सत्र बर्बाद हो रहा है। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के मात्र 44 सांसद संसद को चलने नहीं दे रहे हैं। सवाल यह है कि नाबालिग को सजा दिलवाने वाला बिल पास क्यों नहीं हुआ? यह उन सांसदों के लिए शर्म की बात नहीं जो हंगामा करते हैं। संसद में छोटी-छोटी बातों को लेकर बड़े से बड़ा हंगामा होता है, लेकिन बलात्कारी को सजा के मामले में हमारी यह संसद गंभीर नहीं होती। बताया जा रहा है कि नाबालिग की उम्र घटाने के मामले में अनेक सांसदों को रुचि इसलिए नहीं है, क्योंकि उनके परिवार के युवा सदस्य भी कानून के शिकंजे में आ सकते हैं। इसलिए अनेक सांसद यह नहीं चाहते कि अपराध के मामले में नाबालिग की उम्र को आधार माना जाए। यदि अपराध की उम्र 16 वर्ष मानली जाती है तो आज निर्भयाा का बलात्कारी जेल से बाहर नहीं आता। इसे शर्मनाक ही कहा जाएगा कि इस मुद्दे पर देश के किसी भी राजनीतिक दल ने गंभीरता नहीं दिखाई। 
तीन वर्ष पहले जैसे हालात
20 दिसम्बर को दिल्ली में एक बार फिर तीन वर्ष पहले जैसे हालात उत्पन्न हो गए हैं। इंडियागेट के बाहर निर्भया के माता-पिता के साथ प्रदर्शन कर रहे हजारों लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने की जिद कररहे हैं। देशवासियों को याद होगा कि तीन वर्ष पहले जब निर्भया के साथ गैंगरेप हुआ था। तब देश में कांग्रेस का शासन था। इसी इंडियागेट और जतंर-मंतर पर देश का युवा उमड़ पड़ा था। तब भी पीएम, राष्ट्रपति, सोनिया गांधी,राहुल गांधी से मिलने की जिद्द हुई थी। दिल्ली का पूरा माहौल अराजक था। अब हालात बदले हुए हैं। अरविंद केजरीवाल दिल्ली के सीएम और नरेन्द्र मोदी देश के पीएम बने बैठे हैं। देखना है कि वर्तमान सत्ताधीश इन परिस्थितियों से कैसे निपटते हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी 21 दिसम्बर को सुनवाई करेगा। 

(एस.पी. मित्तल)
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Saturday, 19 December 2015

काश! कोई कह दे राजेन्द्र हाड़ा जी जिन्दा हैं।



आज यह ब्लॉग मैं बेहद ही दुखी मन से लिख रहा हूं। मुझे इस हकीकत का पता है कि अब मेरे वरिष्ठ साथी एडवोकेट राजेन्द्र हाड़ा जी अब कभी भी दफ्तर नहीं आएंगे और न ही मुझसे कभी किसी काम के बारे में पूछेंगे। दैनिक पंजाब केसरी के अजमेर ब्यूरो दफ्तर में प्रतिदिन दोपहर 3 बजे आने वाले राजेन्द्र हाड़ा का चेहरा मुझे अब कभी भी देखने को नहीं मिलेगा। क्योंकि 19 दिसम्बर को सायं 4 बजे मैं हाड़ा जी के मृत शरीर का अंतिम संस्कार कर आया हूं। अजमेर के आशागंज स्थित श्मशान स्थल पर जब उनका इकलौता मासूम बेटा अपने पिता को अग्नि दे रहा था, तब मेरी आंखों में आंसू थे। 19 दिसम्बर को सुबह कोर्ट जाने के लिए हाड़ा जी उठे। दैनिक कार्य करने के बाद नहाए और कोर्ट जाने के लिए तैयार हुए, लेकिन तभी अपने घर पर ही चक्कर खाकर ऐसे गिरे कि फिर उठ ही नहीं पाए। परिजन तत्काल हाड़ा जी को नेहरू अस्पताल ले गए। जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हाड़ा जी की मौत का सदमा सबसे ज्यादा उनके बेटे और पत्नि को लगा है और परिजन भी आहत हैं। लेकिन मैं अभी यह समझ ही नहीं पा रहा कि अब कभी भी हाड़ा जी के साथ काम करने के अवसर नहीं मिलेगा। कोई माने या नहीं, लेकिन मुझे लम्बे समय तक राजेन्द्र हाड़ा जी का रोजाना दोपहर तीन बजे दफ्तर आने का इंतजार रहेगा। मुझे नहीं पता कि यह इंतजार मेरे मन से कब खत्म होगा। हाड़ा जी पेशे से वकील रहे। लेकिन पत्रकारिता में वे हमेशा सक्रिय रहे। हाड़ा जी ने दैनिक नवज्योति और दैनिक भास्कर में लम्बे समय तक काम किया। अखबारों में कई पृष्ठों के इंचार्ज रहे। हाड़ा जी की लेखनी का कोई मुकाबला नहीं रहा। किसी भी विषय पर लिखना उन्हें अच्छी तरह आता था। मात्र 52 वर्ष की उम्र में इस संसार को छोड़कर चले जाएंगे इसका आभास स्वयं राजेन्द्र हाड़ा को भी नहीं था। 18 दिसम्बर को जब रोजाना की तरह हाड़ा जी दफ्तर आए तो अपने दायित्व का अच्छी तरह निर्वहन किया और कल फिर आएंगे इस वायदे के साथ दफ्तर से रवाना हो गए। भगवान मुझे भविष्य के बारे में जानने की इतनी ताकत देता कि मैं हाड़ा जी के 19 दिसम्बर के बारे में जान जाता तो 18 दिसम्बर को हाड़ा जी को दफ्तर से जाने ही नहीं देता। मुझे क्या पता था कि 18 दिसम्बर का दिन हाड़ा जी के लिए आखिरी दिन था। यदि हाड़ा जी को कोई रोग होता तो हम उसका भरपूर इलाज करवाते। हाड़ा जी के छोटे भाई डॉ. प्रियशील हाड़ा तो खुद अनुभवी चिकित्सक हैं। न जाने डॉ. हाड़ा ने कितने लोगों को जीवन दान दिया है। डॉ. हाड़ा को भी इस बात का अफसोस है कि राजेन्द्र हाड़ा ने शरीर को जांच पड़ताल करने तक का अवसर नहीं दिया। डॉ. हाड़ा धोलाभाटा क्षेत्र में रहते हैं। जबकि राजेन्द्र हाड़ा भगवान गंज। सुबह खबर आई कि बड़े भाई बेहोश हो गए हैं। उन्हें नेहरू अस्पताल ले जाया जा रहा है। खबर मिलते ही डॉ. हाड़ा नेहरू अस्पताल पहुंचे तो देखा कि राजेन्द्र हाड़ा मृत हो चुके हैं। यानि घर से अस्पताल के बीच ही राजेन्द्र हाड़ा ने आखिरी सांस ली। मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि स्वर्गीय हाड़ा जी की पत्नि, बेटे और अन्य परिजनों को इस आघात को सहन करने की ताकत दे, क्योंकि हाड़ा जी जाने से पहले अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा नहीं कर पाए।
(एस.पी. मित्तल)
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Friday, 18 December 2015

अजमेर में होगी इक्यावन अरब राम नाम के मंत्रों की परिक्रमा



धार्मिक नगरी अजमेर में इक्यावन अरब हस्तलिखित श्रीराम नाम के मंत्रों की परिक्रमा का एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया है। श्रीराम नाम महामंत्र परिक्रमा समारोह समिति के संयोजक कंवलप्रकाश किशनानी, सुभाष काबरा, उमेश गर्ग ने 18 दिसम्बर को एक प्रेस क्रांफेंस में बताया कि परिक्रमा महोत्सव की शुरूआत 21 दिसम्बर को प्रात: 8 बजे अजमेर के आजाद पार्क में होगी। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानन्द महाराज होंगे। जबकि इस अवसर पर हरिसेवाधाम भीलवाड़ा के महंत हंसराम उदासीन, राजगढ़ मसानिया भैरव धाम के उपासक चंपालाल महाराज, चित्रकूट धाम पुष्कर के अधिष्ठाता पाइक् महाराज, सेवाधाम गनाहेड़ा के महामंडलेश्वर दिव्य मुरारी बापू, संन्यास आश्रम के शिवज्योतिषानंद, हनुमान धाम के संत कृष्णानंद, देव नारायण मंदिर पुष्कर के महंत दयालनाथ एवं ईश्वर मोहन उदासीन आश्रम के स्वामी स्वरूपानंद उपस्थित  रहेंगे। 
उन्होंने बताया कि आगामी 1 जनवरी तक प्रात: 6.15 बजे से रात 8 बजे तक श्रद्धालु रामनाम की पुस्तकों की परिक्रमा कर सकेंगे। राम नाम वाली पुस्तकों को आजाद पार्क में एक भव्य मंच पर रखा जाएगा। इक्यावन अरब राम मंत्र की परिक्रमा करना अपने आप में पुण्य की प्राप्ति होगी। परिक्रमा के दौरान ही प्रतिदिन 3.30 बजे से सुन्दरकांड का पाठ होगा तथा देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों के पीठाधीश्वर प्रवचन देंगे। सायं 6 बजे महाआरती और 7 बजे से सत्संग एवं भजन होंगे। कार्यक्रम का समापन 1 जनवरी को दोपहर 3.30 बजे सीकर स्थित रेवासा पीठ के पीठाधीश राघवाचार्य महाराज की उपस्थिति में होगा।
(एस.पी. मित्तल)
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माफी मांगने के नाम पर शाहरूख ने उड़ाया मजाक। दिलवाले पर पुलिसवालों का पहरा।


देश में असहिष्णुता का माहौल बताकर विवादों में आए फिल्म अभिनेता शाहरूख खान की फिल्म दिलवाले 18 दिसम्बर को देशभर में रिलीज हो गई। इसके साथ ही सिनेमाघरों के बाहर फिल्म के प्रदर्शन का जोरदार विरोध भी हुआ। इस विरोध के चलते अधिकांश सिनेमाघरों में दर्शकों की उपस्थिति नहीं के बराबर हुई। राजस्थान सहित देश के प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों के सिनेमाघरों के बाहर प्रदर्शनकारियों को खदेडऩे के लिए पुलिस को डंडे बरसाने पड़े। अब दिलवाले सिनेमाघरों पर पुलिसवालों का पहरा लग गया है। हालांकि विरोध को कम करने के लिए शाहरूख खान ने दो दिन पहले माफी मांगने का प्रयास किया लेकिन फिल्म प्रेमियों का मानना है कि शाहरूख ने माफी मांगने के बजाय देशभर के फिल्म प्रेमियों का मजाक उड़ाया है। शाहरूख ने बहुत ही भद्दे और मजाकिया लहजे में कहा कि दिलवाले फिल्म मेरे अकेले की नहीं है बल्कि इसके पीछे सैकड़ों परिवार खड़े हैं जिनकी रोजी रोटी इस फिल्म से जुड़ी हुई है। अभी तो मैं माफी मांग रहा हूं लेकिन जब यह फिल्म सुपर ड्यूपर हो जाएगी तब बात करूंगा। यानी अपने असहिष्णुता वाले बयान पर शाहरूख खान को अभी भी कोई अफसोस नहीं है। उनका मानना है कि वे अपने देश के बारे में कुछ भी कहें, लेकिन फिल्म प्रेमी तो उनकी फिल्म देखेंगे ही। शाहरूख के इस आत्मविश्वास से यह भी प्रतीत होता है कि उन्हें विरोध करने वालों की भी कोई परवाह नहीं है। यही वजह रही कि शाहरूख के कथित माफीनामे को 18 दिसम्बर को विरोध करने वालों ने खारिज कर दिया। नाराज लोगों का कहना रहा कि शाहरूख सिर्फ व्यवसायी दृष्टि से माफी मांगने का नाटक कर रहे हैं। यदि ईमानदारी के साथ शाहरूख माफी मांगते तो यह नहीं कहते कि उनकी फिल्म तो सुपर ड्यूपर हिट हो ही जाएगी। शाहरूख की कथित माफी मांगने और फिल्म प्रेमियों का मजाक उड़ाने वाला वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इस वीडियो के कारण ही फिल्म प्रेमियों में शाहरूख के प्रति गुस्सा है। जो लोग इस वीडियो को देख और सुन रहे हैं उनका मानना है कि शाहरूख को अपने असहिष्णुता वाले बयान पर कोई अफसोस नहीं है।
(एस.पी. मित्तल)
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दिल्ली की अदालत में पेशी पर राहुल-सोनिया, केजरीवाल की तरह बेवकूफी नहीं करेंगे।



बहुचर्चित नेशनल हेराल्ड अखबार की सम्पत्ति को कब्जाने के मामले में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और उनके पुत्र व राट्रीय  उपाध्यक्ष राहुल गांधी को 19 दिसम्बर को दिल्ली की मेट्रोपोलियन अदालत में उपस्थित होना है। राहुल सोनिया ने पहले ही कह दिया है कि वे दोनों अदालत में उपस्थित होंगे। लेकिन अभी यह पता नहीं चला है कि राहुल सोनिया कानून के मुताबिक अदालत में जमानती दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे या नहीं। लेकिन इतना जरूर कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली का सीएम बनने से पहले जमानती दस्तावेज प्रस्तुत न कर जेल जाने की जो बेवकूफी की थी, वैसी बेवकूफी राहुल सोनिया नहीं करेंगे। हालांकि नेशनल हेराल्ड के मामले में राहुल सोनिया पर अभी कोई आरोप निर्धारित नहीं हुए हैं, लेकिन हमारे देश में आज भी अंग्रेजी शासन के कानून लागू होते हैं। अंग्रेजों ने ऐसा कानून बनाया था कि अदालत में उपस्थित होने के बाद संबंधित व्यक्ति को जमानती दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं यानी आगामी पेशी पर यदि उपस्थित नहीं हुए तो संबंधित जमानती की जवाबदेही होगी और जमानत राशि जप्त कर ली जाएगी। हालांकि अब यह एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन जागरुक पाठकों को याद होगा कि केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मानहानि वाले प्रकरण में केजरीवाल ने जमानती दस्तावेज प्रस्तुत करने से इंकार कर दिया था। तब केजरीवाल का कहना रहा कि अभी उन पर कोई आरोप निर्धारित नहीं हुआ है, इसलिए स्वयं को मुल्जिम मानते हुए जमानती दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करेंगे। इस पर अंग्रेजों के बनाए कानून के आधार पर अदालत ने केजरीवाल को जेल भेज दिया। कोई दस दिन बाद केजरीवाल जेल से तभी बाहर आए जब अदालत में जमानत के दस्तावेज जमा करा दिए। कानून के जानकारों ने तब इसे केजरीवाल की बेवकूफी ही माना। क्योंकि कानून के मुताबिक कोई भी अदालत आरोपी को जमानती दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने पर घर नहीं भेज सकती।
अंग्रेजों के जिन कानूनों के आधार पर कांग्रेस ने इस देश में 50-55 वर्ष तक राज किया, अब उसी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष को उसी कानून से गुजरना पड़ेगा। संभवत: यह पहला अवसर होगा, जब राहुल-सोनिया एक साथ मुल्जिम के तौर पर किसी अदालत में उपस्थित होंगे। दोनों को अब अंग्रेजों के कानून के बारे में पता चल रहा होगा कि जो आरोप साबित ही नहीं हुए है, उनमें दोनों को अभिुयक्त माना जा रहा है। न जाने कितने लोग अंग्रेजों के इस कानून से प्रताडि़त होते रहे। इन दिनों दिल्ली का तापमान बहुत गिरा हुआ है। सोनिया गांधी हाल ही में अमरीका में अपने स्वास्थ्य की जांच करवाकर लौटी हैं। दिल्ली में हाड़ कपकपाने वाली सर्दी को देखते हुए कोई भी व्यक्ति तिहाड़ जेल नहीं जाना चाहेगा। वैसे भी राहुल-सोनिया के सामने सुब्रह्मणयम स्वामी जैसे तेजतर्रार वकील हैं। यदि सोनिया-राहुल ने जमानती दस्तावेज प्रस्तुत करने में जरा सी भी ना नुकर की तो फिर मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट के सामने तिहाड़ जेल भेजने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। 
तो कांग्रेसियों को भी जाना पड़ेगा जेल:
माना तो यही जा रहा है कि 19 दिसम्बर को सोनिया गांधी और राहुल गांधी अदालत में उपस्थित होकर चुपचाप जमानती दस्तावेज प्रस्तुत कर अगली तारीख पेशी हासिल कर लेंगे। लेकिन यदि ऐन मौके पर वकील सुब्रह्मणयम स्वामी ने कोईबखेड़ा कर दिया तो मजबूरी में राहुल-सोनिया को जेल भी जाना पड़ सकता है। यदि मां-बेटे जेल गए तो देशभर में कांग्रेसियों को भी अपने अपने शहर की जेलों में जाना पड़ेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि राहुल सोनिया तो सर्दी के मौसम में तिहाड़ जेल चले जाए और कांग्रेसी अपने घरों पर गरम बिस्तारों मं सोते रहे। कांग्रेसियों को प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर से भी कोई दिशा निर्देश नहीं मिले हैं। ऐसे में यही माना जा रहा है कि राहुल सोनिया के पेशी शांतिपूर्ण तरीके से निपट जाएगी। 
(एस.पी. मित्तल)
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Thursday, 17 December 2015

देश में असहिष्णुता अब शाहरुख की फिल्म दिलवाले तय करेगी।



18 दिसम्बर को रिलीज हो रही फिल्म दिलवाले यदि बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई तो यह माना जाएगा कि देश में असहिष्णुता है और यदि इस फिल्म ने आय के रिकॉर्ड तोड़े तो यह माना जाएगा कि देश में सहिष्णुता बनी हुई है। असल में इस फिल्म के हीरो शाहरुख खान हैं, ये वही शाहरुख खान है जिन्होंने पिछले दिनों देश में असहिष्णुता होने की बात कही थी। इसके बाद से ही शाहरुख पर लगातार जुबानी हमले हो रहे हैं। आम लोगों की यह पीड़ा रही कि जिस शाहरुख ने एक सर्कस में अभिनय से अपनी जिन्दगी शुरू की थी, उस शाहरुख को इस देश के लोगों ने अपनी आंखों की पलकों पर बैठाया और आज वही शाहरुख देश में साम्रदायिक माहौल खराब होने की बात कह रहे हैं। यदि देश के आम लोगों के मन में शाहरुख के प्रति दुर्भावाना होती तो उनकी अनेक फिल्में हिट होने के बजाए फ्लाप होती। शाहरुख ने जब से असहिष्णुता वाला बयान दिया, तब से समाचार माध्यमों से शाहरुख की आलोचना हो रही हे। यहां तक कि उनकी फिल्में देखने वाले भी नाराज हैं। जनभावनाओं को भांपते हुए दिलवाले के रिलीज होने से पहले शाहरुख ने फिल्मी स्टाइल में असहिष्णुता वाले बयान पर माफी भी मांग ली है। शाहरुख को डर है कि यदि उनमें प्रशंसक नाराज होकर फिल्म नहीं देखेंगे तो दिलवाले फ्लॉप हो जाएगी। हालांकि इस फिल्म को हिट करने में शाहरुख खान कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। 
जितने भी टीवी सीरियल हैं, उन सभी में अभिनेत्री काजोल को लेकर जा रहे हैं। भले ही किसी सीरियल की लोकप्रियता न हो, लेकिन फिर भी शाहरुख कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसी सिलसिले में बहुत कम टीआरपी वाले न्यूज चैनलों के स्टूडियो में भी शहारुख खान दस्तक दे रहे हैं। जबकि इससे पहले शाहरुख की जितनी भी फिल्में रिलीज हुई तो चुनिंदा सीरियलों और न्यूज चैनलों में ही जाते थे। शाहरुख खान उम्र के जिस मुकाम पर खड़े हैं, उसमें दिलवाले के फ्लाप हो जाने पर शाहरुख की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हो सकता है कि फिल्म के निर्माता को घाटा उठाना पड़े। लेकिन देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता का जो माहौल चल रहा है, उस पर इस फिल्म को लेकर जरूर असर होगा। एक ओर शाहरुख जहां इस फिल्म को हिट करने में सारे तौर तरीके अपना रहे हैं, वहीं उनके खिलाफ प्रचार माध्यमों में एक बड़ा अभियान चल रहा है, जिसके अंतर्गत यह अपील की जा रही है कि शाहरुख की 18 दिसम्बर को रिलीज होने वाले फिल्म दिलवाले को न देखा जाए।  सवाल किसी एक फिल्म के हिट और फ्लॉप होने का नहीं है, बल्कि देश के माहौल का है। शाहरुख समझे या नहीं, लेकिन शाहरुख की फिल्म के फ्लॉप होने पर वे ताकते सक्रिय होंगी, जिनकी सियासत वाली सोच है। यह माना कि शाहरुख खान एक अच्छे कलाकार हंै, लेकिन शाहरुख को उन ताकतों से बचना होगा जो उनकी फिल्म पर चढ़कर देश का माहौल खराब करने की फिराक में है। सवाल यह भी है कि यदि देश में असहिष्णुता है तो उसे खत्म करने की जिम्मेदारी भी शाहरुख खान जैसे कलाकारों की है। क्योंकि इसी देश के लोगों ने सर्कस में काम करने वाले एक कलाकार को आसमान की ऊंचाइयों पर बैठाया है। यदि शाहरुख खान जैसे कलाकार कथित तौर पर देश के बिगड़े माहौल को नहीं सुधारेंगे तो फिर कौन आगे आएगा? अच्छा होता कि शाहरुख खान असहिष्णुता वाला बयान देने से बचते। 


(एस.पी. मित्तल)
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तो ललित मोदी और वसुंधरा राजे में अब नहीं रही दुश्मनी।



16 दिसम्बर को रात आठ बजे जीटीवी के राजस्थान के न्यूज चैनल पर राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) में हुए ताजा बदलाव को लेकर एक लाइव कार्यक्रम हुआ। इस कार्यक्रम में मैंने भी भाग लिया। मेरे सामने आरसीए के उपाध्यक्ष अमीन पठान और अन्य पदाधिकारी बैठे थे। मैंने यह जानना चाहा कि 15 दिसम्बर को न्यायाधीश ज्ञान सुधा मिश्रा के समक्ष ललित मोदी के खिलाफि अश्विास प्रस्ताव को वापस लेने से पहले क्या ललित मोदी से कोई वार्ता हुई? पठान ने बहुत ही साफ गोई से स्वीकार किया कि मैंने मोदी से किसी भी प्रकार से कोई संवाद नहीं किया। पठान की इस साफ गोई से जाहिर था कि आरसीए की लड़ाई मोदी और अमीन पठान के बीच नहीं है। पठान तो मोहरा बने हुए हैं, लेकिन वे अपने दायित्व को ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं। मैं यहां अमीन पठान की वफादारी और साफ गोई की प्रशंसा करने में कोई कंजूसी नहीं करुंगा। लेकिन इतना जरूर कहना चाहंूगा कि अब राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे और क्रिकेट के किंग रहे, ललित मोदी के बीच दुश्मनी नहीं रही है। मुझे नहीं पता कि राजे और मोदी के बीच फिर से पारिवारिक संबंध कायम हुए है या नहीं। लेकिन आरसीए के ताजा बदलाव से प्रतीत होता है कि दुश्मनी तो खत्म हो गई है। 
सब जानते हैं कि ललित मोदी इस समय इग्लैंड में है। एक समय था, जब राजे के पिछले कार्यकाल में कांग्रेस के दिग्गज नेता सी.पी.जोशी का तख्ता पलट कर मोदी को आरसीए का अध्यक्ष बनाया था। लेकिन राजे के दूसरे शासन में एक वर्ष पहले मोदी को न केवल अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, बल्कि बीसीसीआई तक ने मोदी पर गंभीर आरोप लगाए। मोदी पर शायद ही कोई आरोप बचा हो जो  न लगा हो इसे सियासत ही कजा जाएगा कि आरसीए के पदाधिकारियों ने एक बार फिर उसी ललित मोदी को अध्यक्ष स्वीकार कर लिया है। मोदी को लेकर वर्षाकालीन संसद सत्र में जोरदार हंगामा भी हुआ, लेकिन हो सकता है कि गुप्त समझौते के मुताबिक आने वाले दिनों में ललित मोदी स्वयं ही आरसीए के अध्यक्ष का पद छोड़ दें। शर्त के अनुसार ही एक बार मोदी का सम्मान वापस हो गया है, यानी मोदी को सार्वजनिक तौर पर अध्यक्ष मान लिया गया है। यह बात मोदी भी अच्छी तरह समझते हैं कि लंदन में बैठ कर आरसीए को नहीं चलाया जा सकता। मोदी की वजह से ही बीसीसीआई ने आरसीए को बेन कर रखा है। पिछले एक वर्ष से राजस्थान मेंअंतर्राष्ट्रीय स्तर का कोई मैच नहीं हो पाया। यहां तक कि जयपुर के एसएमएस स्टेडियम में भी ताले लगने की नौबत आ गई है। ऐसे में प्रदेश के क्रिकेट और क्रिकेट खिलाडिय़ों दोनों का भारी नुकसान हो रहा है। लेकिन अब उम्मीद की जानी चाहिए कि राजस्थान क्रिकेट के दिन अच्छे आएंगे। इस मामले में सीएम वसुंधरा राजे के सकारात्मक रुख की भी प्रशंसा होनी चाहिए। राजे ने अपने स्वभाव के विपरीत दुश्मनी को खत्म करने की पहले की है। ताजा प्रकरण से प्रतीत होता है कि वसुंधरा राजे अब किसी भी स्तर पर कोई विवाद करने के पक्ष में नहीं है। 

(एस.पी. मित्तल)
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जाम से बचने के लिए पहले अजमेर ट्रेफिक पुलिस को सुधारना होगा।



अजमेर में ट्रेफिक जाम की समस्या को लेकर 14 दिसम्बर को मैंने ब्लॉग पोस्ट किया था। अगले दिन स्थानीय समाचार पत्रों में भी ट्रेफिक जाम की खबरें प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुई। मेरे ब्लॉग से लेकर समाचार पत्रों तक से जो दबाव बना। उसी का परिणाम रहा कि निष्क्रिय टे्रफिक पुलिस में थोड़ी बहुत हलचल हुई। ट्रेफिक पुलिस की डिप्टी अदिती कामठ ने एक साथ तीन चार विभागों को पत्र लिख दिए। कामठ का यह कहना रहा कि शहर में होने वाले ट्रेफिक जाम के लिए पुलिस जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए पीडब्ल्यूडी, नगर निगम, परिवहन विभाग आदि जिम्मेदार हंै। ट्रेफिक पुलिस अपने बचाव में कुछ भी कह सकती है, लेकिन सवाल उठता है कि आखिर ट्रेफिक पुलिस अपनी ड्यूटी को सही तरीके से अंजाम क्यों नहीं देती? सबको पता है कि शहर के भीड़ वाले बाजार जिला यातायात समिति ने नो वेंडर जोन घोषित कर रखे हैं। ऐसे में इन बाजारों से ठेले वाले और फुटपाथ या दुकानों के बाहर थड़ी लगाकर बैठने वालों को सख्ती से हटाया जाना चाहिए। जिस ट्रेफिक पुलिस के जवान की ड्यूटी बाजार में लगती है, उसकी रुचि ठेले वालों को हटाने में नहीं बल्कि ठेलों की गिनती में रहती है। ट्रेफिक पुलिस के आला अधिकारी क्या यह बता सकते हैं कि मदार गेट जैसे बाजार से ठेले वालों को क्यों नहीं हटाया जाता? सवाल पुलिस में भ्रष्टाचार का नहीं है। सवाल पुलिस की इमेज का है। जिस मुद्दे पर ट्रेफिक पुलिस की इमेज सरेआम खराब हो रही हो, उसमें तो ख्याल करना ही चाहिए। यह माना कि ट्रेफिक में इंतजामों में नगर निगम पीडब्ल्यूडी और परिवहन विभाग की भी भूमिका है, लेकिन यदि ट्रेफिक पुलिस अपनी ड्यूटी शुरू कर दे तो दूसरे विभाग भी सहयोग करने लगेंगे। जो कानून की ताकत ट्रेफिक पुलिस के पास है, वह ताकत नगर निगम, पीडब्ल्यूडी और परिवहन विभाग के पास नहीं है। कोई माने या नहीं लेकिन यह सही है कि पीडब्ल्यूडी, नगर निगम और परिवहन विभाग में किसी भी कर्मचारी और अधिकारी की रुचि बाजारों में खड़े होने वाले ठेलों की गिनती करने में नहीं होती। जब ट्रेफिक पुलिस बाजारों में खड़े होने वाले ठेलों की गिनती में रुचि दिखाएगी तो आरोप तो लगेंगे ही। मैं यह नहीं कहना चाहता कि प्रतिदिन ठेले वालों से 100 रुपए की रिश्वत लेकर बाजारों में खड़े होने दिया जाता है, लेकिन यह सवाल तो उठता ही है कि जब प्रति ठेले की वसूली नहीं होती, तो फिर ठेले खड़े कैसे होते हैं? पुलिस अधीक्षक नितिन दीप ब्लग्गन को इस बात की जांच करवानी चाहिए कि मदार गेट, चूड़ी बाजार, पुरानी मंडी, नया बाजार, दरगाह बाजार, केसरगंज, आगरा गेट आदि भीड़ वाले बाजारों मं ठेले वालों ने स्थाई बसेरा क्यों बना रखा है? अपनी जिम्मेदारी को दूसरे विभागों पर डाल देने से स्वयं को कत्र्तव्य परायाण और ईमानदार साबित नहीं किया जा सकता। मेरा मानना है कि यदि एसपी ब्लग्गन की पुलिस पहल करेगी तो सारे विभाग लाइन बनाकर खड़े हो जाएंगें।

(एस.पी. मित्तल)
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Tuesday, 15 December 2015

भारतीय रेलवे का अजमेर बना पायलट



यहां की बेलन्स शीट काम आएगी देशभर में
भारतीय रेलवे के आय-व्यय के क्षेत्र में अजमेर रेल मंडल को पायलट प्रोजेक्ट बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जानकार सूत्रों के अनुसार भारतीय रेलवे को 14 लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए देशी निवेशकों के साथ-साथ विदेशी निवेशकों का भी सहयोग चाहिए लेकिन विदेशी निवेशक भारतीय रेल में तभी निवेश करने को तैयार थे जब रेलवे के मंडल स्तर पर आय-व्यय की बेलन्स शीट तैयार हो। इसमें मंडल स्तर पर रेलवे की संपत्तियों का भी ब्यौरा अनिवार्य किया गया। इससे पहले रेलवे के मंडल स्तर पर संपत्तियों का ब्यौरा एवं आय-व्यय की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं थी। रेल बजट में भी रेलवे को एक मानकर आय-व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे में रेल मंत्रालय के सामने ऐसे मंडल के चयन की चुनौती थी जिसमें पारदर्शिता और भौतिक सत्यापन के साथ-साथ बेलन्स शीट तैयार की जा सके। देश भर के रेल मंडलों के कामकाज की समीक्षा मंत्रालय में उच्च स्तर पर हुई। विचार मंथन के बाद अजमेर मंडल का चयन किया गया। अजमेर मंडल के लिए यह कार्य चुनौतीपूर्ण था क्योंकि इस तरह का काम देश में पहली बार हो रहा है। लेकिन इस चुनौती को अजमेर के मंडल रेल प्रबंधक नरेश सालेचा ने स्वीकार किया। चूंकि सालेचा लेखा क्षेत्र के ही अधिकारी है इसलिए उन्होंने अपने मंडल की आय और व्यय का विभाजन तो सरलता के साथ किया ही साथ ही मंडल की बेशकीमती संपत्तियों का इन्द्राज भी ऐसे किया जिसे एक नजर में आसानी के साथ देखा जा सके। यह सालेचा की ही मेहनत रही कि उन्होंने तय समय से पहले ही रेल मंत्रालय की मंशा के अनुरुप रिपोर्ट तैयार कर ली। अब इस पायलट रिपोर्ट को रेल मंत्रालय में भेज दिया गया है। इस पायलट रिपोर्ट के आधार पर ही अब देश भर के रेल मंडलों की रिपोर्ट तैयार होगी। मालूम हो कि सालेचा की कार्यशैली की वजह से ही गत दो वर्षो में अजमेर मंडल को न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि अखिल भारतीय और राष्ट्रीय स्तर पर अनेक अवार्ड प्राप्त हुए है।
नियुक्त है कंसलटेंट :
रेलवे के कॉमर्शियल बुकीपिंग के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टेड एकाउटेंट तथा एकाउंटिंग रिफोर्म फाउंडेशन को कंसलटेंट नियुक्त कर रखा है। विश्व में कॉमर्शिलय एकाउंटिंग के क्षेत्र में अब तक केवल छह देश है जिनमें अमेरिका, इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और कोलम्बिया है, लेकिन विश्व बैंक जैसी संस्था के दबाव में अब भारत सहित 119 देशों में कॉमर्शियल एकाउंटिंग पद्धति लागू हो रही है। इस पद्धति के लागू होने से देशी-विदेशी संसाधन जुटाने में आसानी होगी। साथ ही रेलवे की संपत्तियां पारदर्शी बनेगी। आय-व्यय की स्थिति और संपत्तियों को देखकर निवेशक आकर्षित होंगे तथा निवेशकों का दायरा और संख्या भी बढ़ेगी। इसके साथ ही ऑनलाइन एकाउंटिंग होने से कॉमर्शियल डिसिजन लेने में सजहता आएगी।
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(एस.पी. मित्तल)
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अपना घर में मूक-बधिर बच्चों का टोटा। शानदार है सुविधाएं



आमतौर पर यहीं शिकायत मिलती है कि सरकारी संस्थानों में समुचित सुविधाएं नहीं होती, जिसकी वजह से ऐसे संस्थानों में रहने वाले लोग परेशान होते है। लेकिन इस धारणा के उलट अजमेर के कोटड़ा क्षेत्र में मूक बधिर और नेत्रहीन बच्चों का एक आवासीय विद्यालय संचालित हो रहा है। सरकार ने 2 करोड़ रुपए की लागत में शानदार भवन बनाकर दिया है और अब इस विद्यालय का संचालन सामाजिक संस्था अपना घर के द्वारा किया जा रहा है। एक वर्ष पहले विद्यालय भवन का उद्घाटन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने किया था। 15 दिसम्बर को एक वर्ष पूरा होने पर विद्यालय परिसर में एक सादा समारोह आयोजित किया गया। समारोह में मुझे तथा दैनिक भास्कर के अजमेर संस्करण के संपादक डॉ.रमेश अग्रवाल को आमंत्रित किया गया। हमने विद्यालय की पहली वर्षगांठ पर बच्चों को मिठाईयां दी। सर्दी के मौसम में स्वेटर भी बच्चों को वितरित किए गए। इस विद्यालय का संचालन करने वाले सोमरत्न आर्य, विष्णुप्रकाश गर्ग, विनय पाथरीया आदि ने हमें बताया कि फिलहाल इस विद्यालय में पांचवी कक्षा तक के बच्चें पढ़ रहे हैं। विद्यालय की क्षमता 100 बच्चों की है लेकिन अभी 50 मूक बधिर और नेत्रहीन बच्चें ही अध्ययन करते हैं। हमने देखा कि विद्यालय परिसर में शानदार सुविधाएं उपलब्ध थी। बच्चों के बैठने के लिए कक्षा में टेबल कुर्सी के साथ-साथ मूक बधिर बच्चों को पढ़ाने के काम आने वाली पाठ्य सामग्री उपलब्ध थी। सभी कक्षाएं और विद्यालय परिसर साफ-सुथरा नजर आया। विद्यालय को चलाने वालों ने बताया कि फिलहाल सरकार से कोई सहायता नहीं ली गई है क्योंकि सारा खर्चा जन सहयोग से ही किया जा रहा है। हमने देखा कि बच्चों के कमरे भी साफ-सुथरे थे। पलंग पर चार इंच मोटे गद्दे और चद्दर, तकिया आदि बिना किसी गंदगी और खराबी के थे। आमतौर पर सरकारी विद्यालयों में ऐसी सुविधाएं देखने को नहीं मिलती है। विद्यालय में यदि कोई कमी थी तो वह बच्चों की संख्या थी। संचालकों ने कहा कि जो अभिभावक आर्थिक दृष्टि से अपने मूक-बधिर और नेत्रहीन बच्चों को घर पर रखने में असमर्थ हैं, वे अपने बच्चों को इस आवासीय विद्यालय में छोड़ सकते हैं। यहां पूरी तरह पारिवारिक माहौल है और इन विशेष बच्चों की हर कठिनाई का ध्यान रखा जाता है। किसी भी अभिभावक से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। 
कलेक्टर की पहल:
सरकार के इस आवासीय विद्यालय भवन को अपना घर संस्थान को सौंपने में जिला कलेक्टर डॉ. आरुषि मलिक की भी सकारात्मक भूमिका रही है। 15 दिसम्बर को जैसे ही कलेक्टर को यह पता चला कि इस विद्यालय में पढऩे वाले कुछ बच्चे बोलने की कोशिश कर रहे हैं तो कलेक्टर ने तत्काल ही समाज कल्याण विभागके अधिकारियों को निर्देश दिए कि स्पीच थैरेपी वाले विशेषज्ञों को विद्यालय में भेजा जाए। जिन बच्चों की उम्र के हिसाब से आवाज निकलने लगी है, उनकी आवाज को पूर्ण विकसित किया जाए। इसके साथ ही कलेक्टर ने जिले के उपखंड अधिकारियों से भी कहा कि वे अपने-अपने क्षेत्र में मूक बधिर और नेत्रहीन बच्चों का पता लगाकर इस विद्यालय में भिजवावे। कलेक्टर ने कहा कि विद्यालय में बच्चों की संख्या बढ़ाने और सुविधाएं उपलब्ध करवाने में प्रशासन कोई कसर नहीं छोड़ेगा। 
हो सकते है आयोजन:
विद्यालय को चलाने में सक्रिय भूमिका निभाने वाले समाजसेवी सोमत्न आर्य और विष्णु प्रकाश गर्ग ने कहा कि यह विद्यालय कोटड़ा क्षेत्र में सेंट्रल एकेडमी स्कूल के निकट चल रहा है। विशाल विद्यालय परिसर बड़े हॉल व चौक, रसोई घर आदि ऐसी सुविधाएं भी हैं, जहां परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों की स्मृति में आयोजन कर सकते हैं। विद्यालय परिसर में पार्किंग की भी कोई समस्या नहीं है। यदि समृद्ध परिवार कोई आयोजन करते हैं तो विद्यालय में रह रहे बच्चों को भी आत्मबल मिलेगा। विद्यालय में छात्र-छात्राओं को अलग-अलग रखा जाता है। छात्राओं को होने वाली शारीरिक परेशानियों का समाधान भी प्रभावी तरीके से किया जाता है। इसके लिए शिक्षिकाओं को भी नियुक्त कर रखा है। मूक-बधिर बच्चों को पढ़ाने के लिए विशेषज्ञ नियुक्त किए गए हैं। 

एस.पी. मित्तल)
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वसुंधरा के प्रति वफादारी का सिला मिला अशोक परनामी को



अशोक परनामी राजस्थान भाजपा के फिर से अध्यक्ष बन गए हैं। यूं तो परनामी चुनाव की प्रक्रिया से गुजरे, लेकिन सब जानते हैं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रति वफादारी दिखाने की वजह से ही परनामी लगातार दूसरी बार अध्यक्ष बने। सत्तारुढ़ पार्टी का अध्यक्ष होना वाकई गर्व की बात है। लेकिन कईबार सत्ता और संगठन में खींचतान हो जाती है। पूर्व में भी सीएम राजे के समर्थन से ही परनामी अध्यक्ष बने थे। 15 दिसम्बर को हुई घोषणा से पहले 14 दिसम्बर को जयपुर में भाजपा कार्यालय में निर्वाचन अधिकारी दिनेश शर्मा के समक्ष परनामी ने नामांकन दाखिल किया। परनामी के नामांकन के प्रस्तावक के तौर पर सीएम राजे के हस्ताक्षर थे। जिस व्यक्ति के नाम का प्रस्ताव सीएम राजे कर रही हों, तब किस भाजपा नेता की हिम्मत है कि वह परनामी के मुकाबले नामांकन दाखित करें। राजे ने न केवल प्रस्ताव किया बल्कि नामांकन कि सम्पूर्ण प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन अधिकारी के सामने बैठी रहीं। जब परनामी के अलावा किसी का नामांकन आया ही नहीं तो 15 दिसम्बर को निर्वाचन अधिकारी को परनामी के नाम की घोषणा करनी ही पड़ी। सीएम राजे ने चुनाव प्रक्रिया में जिस तरह अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई, उससे साफ लग रहा था कि उनका परनामी पर बहुत भरोसा है। परनामी के सामने किसी दूसरे भाजपा नेता का नाम अध्यक्ष पद के लिए सुनने को भी राजे तैयार नहीं थी। चुनाव प्रक्रिया के समय कोई जरा सी भी आपत्ति न करें, इसके लिए सीमए राजे स्वयं बैठीं रहीं। सब जानते हैं कि परनामी ने पिछले दिनों राजे के प्रति जो वफादारी दिखाई, उसी का सिला अब परनामी को मिला है। कांग्रेस ने पिछले वर्षाकालीन संसद सत्र में जब ललित मोदी से रिश्तों को लेकर राजे के इस्तीफे की मांग की तो मीडिया के सामने परनामी ही वसुंधरा का बचाव करने आए। दिन में जब दिल्ली में कांग्रेस के दिग्गजों ने आरोप लगाए तो इसके तत्काल बाद जयपुर में प्रेस कान्फ्रेंस कर परनामी ने जवाब दिए। राजे के बचाव में लगातार कई दिनों तक परनामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। पिछले दिनों जब परनामी की पत्नी का निधन हुआ तो राजस्थान में खान घोटाला उजागर हो गया। खान विभाग के प्रमुख शासन सचिव अशोक सिंघवी और कई बड़े अधिकारियों के साथ-साथ दलाल भी गिरफ्तार हुए। चूंकि केबिनेट मंत्री स्वयं वसुंधरा राजे ही थी, इसलिए कांग्रेस ने एक बार फिर राजे पर गंभीर आरोप लगाए। तब यह किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि जिन अशोक परनामी की पत्नी का निधन दो दिन पहले हुआ है, वे परनामी मीडिया के सामने बचाव करने आएंगे। लेकिन परनामी ने अपने पारिवारिक शोक को एक तरफ रखते हुए खान घोटाले में राजे का बचाव किया। सीएम राजे पर विपक्ष ने जितने भी आरोप लगाए, उनका किसी का भी जवाब राजे ने आज तक नहीं दिया है। सीएम की ओर  से सभी जवाब परनामी ने दिए। यहां तक कि सरकार के गोपनीय दस्तावेज भी परनामी ने ही मीडिया के सामने रखे।  ललित मोदी को शेयर बेचने के एवज में 12 करोड़ रुपए वसुंधरा राजे की कंपनी द्वारा लिए जाने के व्यक्तिगत दस्तावेज भी परनामी ने ही मीडिया के सामने रखे। जब परनामी अपनी पत्नी के निधन का शोक छोड़कर राजे का बचाव कर सकते हैं तो दोबारा से प्रदेश अध्यक्ष बनने से परनामी को कौन रोक सकता था? सीएम राजे को भी पता है कि जितनी वफादारी परनामी दिखा रहे हैं। उनती वफादारी भाजपा का कोई नेता नहीं दिखा सकता। यही वजह रही कि 15 दिसम्बर को जब निर्वाचन अधिकारी ने परनामी के नाम की घोषणा की तब भी सीएम राजे भाजपा के प्रदेश कार्यालय में उपस्थित रहीं। इस समारोह में राजे ने परनामी की जमकर प्रशंसा की,वहीं परनामी ने राजे के प्रति आभार जताया। यानि वर्तमान में राजस्थान में सत्ता और संगठन का ऐसा तालमेल है,जिसमें बाल बराकर भी सुराग नहीं है।

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Monday, 14 December 2015

कार्यकर्ताओं को जयपुर ले जाने में अजमेर देहात दूसरे नम्बर पर



ब्यावर में रही विवाद की स्थिति
भाजपा सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर 13 दिसम्बर को जयपुर में आयोजित राज्यस्तरीय समारोह में कार्यकर्ताओं को जयपुर ले जाने में प्रदेशभर में अजमेर देहात भाजपा दूसरे स्थान पर रहा है। 
प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा संगठन के किस जिले से कितने कार्यकर्ता जयपुर समारोह में आए, इसकी गणना के लिए इस बार सरकार की ओर से विशेष इंतजाम किए गए थे। इसमें जहां सरकार के बड़े अधिकारियों की भूमिका रही, वहीं संगठन को समर्पित नेताओं ने भी निगरानी का काम किया। कार्यकर्ताओं को जयपुर लाने में पहला स्थान अलवर भाजपा का रहा है, जबकि दूसरे स्थान पर अजमेर देहात का नाम सामने आया है। भाजपा के देहात जिला अध्यक्ष बी.पी.सारस्वत ने बताया कि अब तक कि गणना के मुताबिक 18 हजार भाजपा कार्यकर्ता 13 दिसम्बर को जयपुर गए थे। इसके लिए 302 बसें और 284 कार, जीप आदि वाहनों का इंतजाम किया गया था। अजमेर देहात संगठन में 6 विधानसभ क्षेत्र आते हैं, जबकि अलवर जिले में 11 विधानसभा क्षेत्र हैं। ऐसे में अलवर के मुकाबले अजमेर देहात आधा ही है। इस स्थिति में 18 हजार कार्यकर्ताओं का जयुपर जाना संगठन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। सारस्वत ने बताया कि कार्यकर्ताओं को मतदान केन्द्र तक से एकत्रित किया गया था। कार्यकर्ताओं को जयपुर ले जाने में संगठन के साथ-साथ क्षेत्र के भाजपा विधायकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। सत्ता और संगठन का जिले भर में जो तालमेल बैठाया गया उसी का परिणाम रहा कि अजमेर देहात का स्थान दूसरे नम्बर पर आया है। 
प्रदेशाध्यक्ष के चुनाव में भूमिका:
14 दिसम्बर से शुरू होने वाली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया में भी अजमेर देहात भाजपा के निर्वाचित अध्यक्ष बी.पी.सारस्वत और 6 प्रतिनिधि भाग लेंंगे। इसके लिए प्रदेश कार्यलय से सूचना प्राप्त हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष पद पर अशोक परनामी की दोबारा से ताजपोशी तय मानी जा रही है। सारस्वत भी दोबारा से देहात अध्यक्ष निर्वाचित हुए है। सारस्वत को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रदेशाध्यक्ष परनामी का संरक्षण माना जाता है। जहां एक और अजमेर देहात के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनाव प्रक्रिया में भाग लेंगे, वहीं अभी तक भी अजमेर शहर भाजपा के अध्यक्ष अरविंद यादव के पास जयपुर आने की कोई सूचना नहीं है। मालूम हो कि अजमेर शहर प्रदेश के उन 6 संगठनों में शामिल है, जहां चुनाव नहीं हो सके थे। शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी और महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री श्रीमती अनिता भदेल की आपसी खींचतान की वजह से शहर अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सका था। प्रदेश कार्यालय के सूत्रों के अनुसार प्रदेशाध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया में निर्वाचित अध्यक्ष ही भाग ले सकते हैं। 
ब्यावर में विवाद:
कार्यकर्ताओं को जयपुर ले जाने के मामले में जिले के ब्यावर विधानसभा क्षेत्र में विधायक शंकर सिंह रावत और संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच खींचतान की स्थिति देखने को मिली। ऐन मौके पर संगठन के पदाधिकारियों को विधायक के समर्थकों द्वारा बसें उपलब्ध नहीं करवाने की वजह से कार्यकर्ता खासे परेशान रहे। बाद में कार्यकर्ताओं ने अपने स्तर पर वाहनों का इंतजाम किया और जयपुर के समारोह में उपस्थिति दर्ज करवाई। मंडल अध्यक्ष मुरली तिलोकानी और भाजयुमो के अध्यक्ष मनीष बूरड़ ने कार्यकर्ताओं को ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ब्यावर में विधायक रावत अपने समर्थक जयकिशन बल्दुआ को मंडल अध्यक्ष मानते हैं तो प्रदेश नेतृत्व ने अभी भी तिलोकानी को अध्यक्ष मान रखा है। 

(एस.पी. मित्तल)
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ट्रेफिक जाम में फंसकर पीड़ा को समझे अजमेर एसपी नितिन दीप ब्लग्गन।



अजमेर के एसपी नितिन दीप ब्लग्गन को ट्रेफिक जाम में फंसने की सलाह मैं इसलिए दे रहा हंू, क्योंकि पिछले दिनों ब्लग्गन ने शहर के प्रमुख बाजारों का पैदल चलकर जायजा लिया। तब ब्लग्गन ने कहा कि वे समस्याओं को स्वयं समझना चाहते हैं, ताकि समाधान कर सके। ब्लग्गन ने कोई एक माह पहले ही अजमेर में एसपी का पद संभाला है। आमतौर पर यही धारणा है कि नया अफसर शुरू में ज्यादा ही भागदौड़ करता है। चूंकि अभी एसपी ब्लग्गन का भागदौड़ वाला दौर ही चल रहा है, इसलिए मेरा सुझाव है कि ब्लग्गन एक बार ट्रेफिक जाम में फंसकर आम व्यक्ति की पीड़ा का अहसास करें। जाम में फंसने के लिए ब्लग्गन को किसी खास मौके अथवा विपरीत परिस्थितियों का इंतजार करने की जरुरत नहीं है। ब्लग्गन दिन में किसी भी समय गांधी भवन, आगरा गेट और महावीर सर्किल के चौराहों पर आकर खड़े हो जाएं, तो अपने आप जाम में फंस जाएंगे। ये तीनों चौराहे शहर के प्रमुख चौराहे हैं और जब इन चौराहों पर जाम लगता है तो आस-पास के क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं। कल्पना कीजिए किसी मरीज को जवाहर लाल नेहरू अस्पताल जाना है और वह गांधी भवन के चौराहे पर जाम में फंसा हुआ है, एम्बुलैंस अपना होर्न भी बजा रही है, लेकिन हालात इतने खराब है कि जाम में साइकिल सवार भी नहीं निकल सकता है। यदि किसी तरह एम्बुलैंस ने गांधी भवन का चौराहा पार कर भी लिया तो उसे आगरा गेट और महावीर सॢकल पर भी लम्बा इंतजार करना पड़ेगा। सवाल मरीज और एम्बुलैंस का ही नहीं है। कई बार आम व्यक्ति को भी बेहद जरूरी कार्य होता है। समय पर नहीं पहुंचने की वजह से भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। यदि एसपी ब्लग्गन को वाकई अजमेर के जाम की समस्या को देखना है तो उन्हें पुलिस की कार का त्याग कर चुपचाप किसी निजी कार में फंसना पड़ेगा। ब्लग्गन यह भी देखे कि उनकी ट्रेफिक पुलिस करती क्या है। पहली बात तो जाम के काफी देर बाद पुलिस कर्मी मौके पर आते हैं और फिर जो व्यवस्था करते हैं वो इतनी लचर होती है कि जाम दो घंटे पहले खुल ही नहीं पाता। 14 दिसम्बर को दोपहर एक बजे महावीर सर्किल पर जो जाम लगा तो आगरा गेट और गांधी भवन चौराहे के साथ-साथ सभी भीड़ वाले बाजार जाम हो गए। कोई दो घंटे तक अफरा-तफरी मची रही। पता नहीं एसपी ब्लग्गन को 14 दिसम्बर के जाम के बारे में पता चला या नहीं।
14 दिसम्बर को दोपहर एक बजे न तो कोई जुलूस निकल रहा था और न ही किसी बारात में युवा नाच रहे थे। सामान्य यातायात की वजह से ही जाम हो गया। ब्लग्गन माने या नहीं, लेकिन शहर के आम व्यक्ति की यह धारणा है कि अजमेर में ट्रेफिक पुलिस तो है ही नहीं। चौराहों पर ट्रेफिक पुलिस के जो जवान नजर आते हैं उनका सारा ध्यान बाहर से आने वाले वाहनों और बिना हेलमेट वाले वाहनों के चालकों पर लगा रहता है। सिटी बस, टैम्पो, ऑटो रिक्शा आदि के खिलाफ तो वैसे भी कोई कार्यवाही नहीं होती, क्योंकि ऐसे वाहनों पर बबलू, फजलू, कालू आदि के स्टीगर लगे होते है। प्रत्येक स्टीगर का हिसाब माह के अंत में हो जाता है। यही वजह है कि नगरीय सेवा के ऐसे वाहन जहां चाहे वहां खड़े होते है और जब चाहे तब चलते हैं। चौराहों पर लगी ट्रेफिक लाइटों का होना और न होना बराबर है। 

(एस.पी. मित्तल)
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